10 Class social science Geography Notes in hindi chapter 6 Manufacturing Industries अध्याय - 6 विनिर्माण उद्योग

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10 Class social science Geography Notes in hindi chapter 6 Manufacturing Industries अध्याय - 6 विनिर्माण उद्योग

CBSE Revision Notes for CBSE Class 10 Social Science GEO Manufacturing Industries GEO Manufacturing Industries: Types, spatial distribution, contribution of industries to the national economy, industrial pollution and degradation of environment, measures to control degradation. (One case study to be introduced)

Class 10th social science Geography chapter 6 Manufacturing Industries Notes in Hindi 


📚 अध्याय - 6 📚
👉 विनिर्माण उद्योग 👈

✳️ विनिर्माण :- 

🔹 मशीनों द्वारा बड़ी मात्रा में कच्चे माल से अधिक मूल्यवान वस्तुओं के उत्पादन को विनिर्माण कहते हैं ।

✳️ विनिर्माण का महत्व :-

🔹  विनिर्माण उद्योग से कृषि को आधुनिक बनाने में मदद मिलती है । 

🔹 विनिर्माण उद्योग से लोगों की आय के लिये कृषि पर से निर्भरता कम होती है ।

🔹 विनिर्माण से प्राइमरी और सेकंडरी सेक्टर में रोजगार के अवसर बढ़ाने में मदद मिलती है । 

🔹 इससे बेरोजगारी और गरीबी दूर करने में मदद मिलती है । 

🔹  विनिर्माण द्वारा उत्पादित वस्तुओं से निर्यात बढ़ता है जिससे विदेशी मुद्रा देश में आती है ।

🔹 किसी देश में बड़े पैमाने पर विनिर्माण होने से देश में संपन्नता आती है । 

✳️ राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में विनिर्माण उद्योग का योगदान :-

🔹 सकल घरेलू उत्पाद ( GDP ) में उद्योग का कुल शेअर 27 % है । इसमें से 10 % खनन , बिजली और गैस से आता शेष 17 % विनिर्माण से आता है । लेकिन सकल घरेलू उत्पाद में विनिर्माण का यह शेअर पिछले दो दशकों से स्थिर रहा है ।

🔹 पिछले दशक में विनिर्माण की वृद्धि दर 7 % रही है । 2003 से यह वृद्धि दर 9 से 10 % रही है । अगले दशक के लिये कम से कम 12 % की वृद्धि दर की आवश्यकता है ।

🔹 भारत सरकार ने नेशनल मैन्युफैक्चरिंग काउंसिल ( NMCC ) का गठन किया गया है ताकि सही नीतियाँ बनाई जा सकें और उद्योग सही ढंग से कार्य करे ।

✳️ उद्योग :- 

🔹 विनिर्माण का विस्तृत रूप उद्योग कहलाता है ।

✳️ उद्योग अवस्थिति :-

🔹 उद्योग की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कुछ कारक निम्नलिखित हैं:

👉 कच्चे माल की उपलब्धता

👉 श्रम की उपलब्धता

👉 पूंजी की उपलब्धता

👉 ऊर्जा की उपलब्धता

👉 बाजार की उपलब्धता

👉 आधारभूत ढ़ाँचे की उपलब्धता

🔹 कुछ उद्योग शहर के निकट स्थित होते हैं जिससे उद्योग को कई लाभ मिलते हैं। शहर के पास होने के कारण बाजार उपलब्ध हो जाता है। इसके अलावा शहर से कई सेवाएँ भी मिल जाती हैं; जैसे कि बैंकिंग, बीमा, यातायात, श्रमिक, विशेषज्ञ सलाह, आदि। ऐसे औद्योगिक केंद्रों को एग्लोमेरेशन इकॉनोमी कहते हैं।

🔹 आजादी के पहले के समय में ज्यादातर औद्योगिक इकाइयाँ बंदरगाहों के निकट होती थीं; जैसे कि मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई, आदि। इसके फलस्वरूप ये क्षेत्र ऐसे औद्योगिक शहरी क्षेत्रों के रूप में विकसित हुए जिनके चारों ओर ग्रामीण कृषि पृष्ठप्रदेश थे।

✳️ उद्योग के प्रकार :-

✳️ कच्चे माल के आधार पर वर्गीकरण :-

✴️ कृषि आधारित उद्योग :- कपास, ऊन, जूट, सिल्क, रबर, चीनी, चाय, कॉफी, आदि।

✴️ खनिज आधारित उद्योग :- लोहा इस्पात, सीमेंट, अलमुनियम, पेट्रोकेमिकल्स, आदि।

✳️ भूमिका के आधार पर वर्गीकरण :-

✴️ आधारभूत उद्योग :- जो उद्योग अन्य उद्योगों को कच्चे माल और अन्य सामान की आपूर्ति करते हैं उन्हें आधारभूत उद्योग कहते हैं। उदाहरण: लोहा इस्पात, तांबा प्रगलन, अलमुनियम प्रगलन, आदि।

✴️ उपभोक्ता उद्योग :- जो उद्योग सीधा ग्राहक को सामान सप्लाई करते हैं उन्हें उपभोक्ता उद्योग कहते हैं। उदाहरण: चीनी, कागज, इलेक्ट्रॉनिक्स, साबुन, आदि।

✳️ पूंजी निवेश के आधार पर :-

✴️ लघु उद्योग :- जिस उद्योग में एक करोड़ रुपए तक की पूंजी का निवेश हो तो उसे लघु उद्योग कहते हैं।

✴️ बृहत उद्योग :- जिस उद्योग में एक करोड़ रुपए से अधिक की पूंजी का निवेश हो तो उसे बृहत उद्योग कहते हैं।

✳️ स्वामित्व के आधार पर :-

✴️ सार्वजनिक या पब्लिक सेक्टर :- जो उद्योग सरकारी एजेंसियों द्वारा प्रबंधित होते हैं उन्हें पब्लिक सेक्टर कहते हैं। उदाहरण: SAIL, BHEL, ONGC, आदि।

✴️ प्राइवेट सेक्टर :- जो उद्योग किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह द्वारा संचालित संचालित होते हैं उन्हें प्राइवेट सेक्टर कहते हैं। उदाहरण: टिस्को, रिलायंस, महिंद्रा, आदि।

✴️ ज्वाइंट सेक्टर :- जो उद्योग सरकार और व्यक्तियों द्वारा साझा रूप से प्रबंधित होते हैं उन्हें ज्वाइंट सेक्टर कहते हैं। उदाहरण: ऑयल इंडिया लिमिटेड।

✴️ को-ऑपरेटिव सेक्टर :- जिन उद्योगों का प्रबंधन कच्चे माल के निर्माता या सप्लायर या कामगार या दोनों द्वारा किया जाता है उन्हें को-ऑपरेटिव सेक्टर कहते हैं। इस प्रकार के उद्योग में संसाधनों को संयुक्त रूप से इकट्ठा किया जाता। इस सिस्टम में लाभ या हानि को अनुपातिक रूप से वितरित किया जाता है। मशहूर दूध को‌-ऑपरेटिव अमूल इसका बेहतरीन उदाहरण है। महाराष्ट्र का चीनी उद्योग इसका एक और उदाहरण है। लिज्जत पापड़ भी को-ऑपरेटिव सेक्टर का एक अच्छा उदाहरण है।

✳️ कच्चे और तैयार माल की मात्रा और भार के आधार पर :-

✴️ भारी उद्योग :- लोहा इस्पात

✴️ हल्के उद्योग :- इलेक्ट्रॉनिक्स

✳️ विनिर्माण कपड़ा उद्योग :-

🔹 भारत की अर्थव्यवस्था में कपड़ा उद्योग अत्यंत महत्वपूर्ण है। देश के कुल औद्योगिक उत्पाद का 14% कपड़ा उद्योग से आता है। रोजगार के अवसर प्रदान करने के मामले में कृषि के बाद कपड़ा उद्योग का स्थान दूसरे नंबर पर है। इस उद्योग में 3.5 करोड़ लोगों को सीधे रूप से रोजगार मिलता है। सकल घरेलू उत्पाद में कपड़ा उद्योग का शेअर 4% है। यह भारत का इकलौता उद्योग है जो वैल्यू चेन में आत्मनिर्भर है और संपूर्ण है।


✳️ सूती कपड़ा :- 


🔹 पारंपरिक तौर पर सूती कपड़े बनाने के लिए तकली और हथकरघा का इस्तेमाल होता था। अठारहवीं सदी के बाद पावर लूम का इस्तेमाल होने लगा। किसी जमाने में भारत का कपड़ा उद्योग अपनी गुणवत्ता के लिये पूरी दुनिया में मशहूर था। लेकिन अंग्रेजी राज के समय इंगलैंड की मिलों में बने कपड़ों के आयात के कारण भारत का कपड़ा उद्योग तबाह हो गया था।


🔹 वर्तमान में भारत में 1600 सूती और सिंथेटिक कपड़े की मिलें हैं। उनमें से लगभग 80% प्राइवेट सेक्टर में हैं। बाकी की मिलें पब्लिक सेक्टर और को-ऑपरेटिव सेक्टर में हैं। इनके अलावा हजारों ऐसी छोटी-छोटी फैक्टरियाँ हैं जिनके पास चार से लेकर दस करघे हैं।


✳️ सूती कपड़ा उद्योग की अवस्थिति :-


🔹 शुरुआती दौर में यह उद्योग महाराष्ट्र और गुजरात के कॉटन बेल्ट तक ही सीमित हुआ करता था। सूती कपड़ा उद्योग के लिये यह बेल्ट आदर्श था क्योंकि यहाँ कच्चे माल, बंदरगाह, यातायात के साधन, श्रम, नम जलवायु, आदि की उपलब्धता थी। यह उद्योग से कपास उगाने वालों, कपास चुनने वालों, धुनाई करने वालों, सूत की कताई करने वालों, रंगरेजों, डिजाइनर, पैकिंग करने वालों और दर्जियों को रोजगार प्रदान करता है। कपड़ा उद्योग कई अन्य उद्योगों को भी पालता है; जैसे केमिकल और डाई, मिल स्टोर, पैकेजिंग मैटीरियल और इंजीनियरिंग वर्क्स।


🔹 आज भी कताई का काम मुख्य रूप से महाराष्ट्र, गुजरात और तामिलनाडु में केंद्रित है। लेकिन बुनाई का काम देश के कई हिस्सों में फैला हुआ है।


🔹 भारत जापान को सूती धागे निर्यात करता है। सूती उत्पाद अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, फ्रांस, पूर्वी यूरोप, नेपाल, सिंगापुर, श्रीलंका और अफ्रिकी देशों को भी निर्यात किये जाते हैं।

🔹 चीन के बाद भारत के पास स्पिंडल्स (तकुओं) की दूसरी सबसे बड़ी क्षमता है। वर्तमान में भारत में 3.4 करोड़ के आस पास स्पिंडल्स की क्षमता है। सूती धागे के विश्व व्यापार में भारत की हिस्सेदारी एक चौथाई यानि 25% है। लेकिन सूती पोशाकों के व्यवसाय में भारत का शेअर केवल 4% ही है। हमारे स्पिनिंग मिल इतने सक्षम हैं कि ग्लोबल लेवेल पर कंपीट कर सकते हैं और जो भी रेशे हम उत्पादित करते हैं उन सबकी खपत कर सकते हैं। लेकिन हमारे बुनाई, कताई और प्रक्रमण यूनिट उतने सक्षम नहीं हैं कि देश में बनने वाले उच्च क्वालिटी के रेशों का इस्तेमाल कर सकें।


✳️ सूती कपड़ा उद्योग की समस्याएँ :-


🔹 इस उद्योग की मुख्य समस्याएँ हैं बिजली की अनियमित सप्लाई और पुरानी मशीनें। इसके अलावा अन्य समस्याएँ हैं; श्रमिकों की कम उत्पादकता और सिंथेटिक रेशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा।


✳️ जूट उद्योग :-


🔹 कच्चे जूट और जूट से बने सामानों के मामले में भारत विश्व का सबसे बड़ा उत्पादक है। बंगलादेश के बाद भारत जूट का दूसरे नंबर का निर्यातक है। भारत की 70 जूट मिलों में ज्यादातर पश्चिम बंगाल में हैं जो मुख्यतया हुगली नदी के किनारे स्थित हैं। जूट उद्योग एक पतली बेल्ट में स्थित है जो 98 किमी लंबी और 3 किमी चौड़ी है।


✳️ हुगली घाटी के गुण :-


🔹 हुगली घाटी के मुख्य गुण हैं; जूट उत्पादक क्षेत्रों से निकटता, सस्ता जल यातायात, रेल और सड़क का अच्छा जाल, जूट के परिष्करण के लिये प्रचुर मात्रा में जल और पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा और उत्तर प्रदेश से मिलने वाले सस्ते मजदूर।


🔹 जूट उद्योग सीधे रूप से 2.61 लाख कामगारों को रोजगार प्रदान करता है। साथ में यह उद्योग 40 लाख छोटे और सीमांत किसानों का भी भरण पोषण करता है। ये किसान जूट और मेस्टा की खेती करते हैं।


✳️ जूट उद्योग की चुनौतियाँ :-


🔹 जूट उद्योग को सिंथेटिक फाइबर से कड़ी प्रतिस्पर्धा मिल रही है। साथ में इसे बंगलादेश, ब्राजील, फिलिपींस, मिस्र और थाइलैंड से भी प्रतिस्पर्धा मिल रही है। सरकार ने पैकेजिंग में जूट के अनिवार्य उपयोग की नीति बनाई है। इसके कारण देश के अंदर ही मांग में वृद्धि हो रही है। 2005 में नेशनल जूट पॉलिसी बनाई गई थी जिसका उद्देश्य था जूट की उत्पादकता, क्वालिटी और जूट किसानों की आमदनी को बढ़ाना। विश्व में पर्यावरण के लिये चिंता बढ़ रही है और पर्यावरण हितैषी और जैवनिम्नीकरणीय पदार्थों पर जोर दिया जा रहा है। इसलिये जूट का भविष्य उज्ज्वल दिखता है। जूट उत्पाद के मुख्य बाजार हैं अमेरिका, कनाडा, रूस, अमीरात, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया।


✳️ चीनी उद्योग :-


🔹 विश्व में भारत चीनी का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। भारत गुड़ और खांडसारी का सबसे बड़ा उत्पादक है। भारत में 460 से अधिक चीनी मिलें हैं; जो उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तामिलनाडु, आंध्र प्रदेश, गुजरात, हरियाणा और मध्य प्रदेश में फैली हुई हैं। साठ प्रतिशत मिलें उत्तर प्रदेश और बिहार में हैं और बाकी अन्य राज्यों में हैं। मौसमी होने के कारण यह उद्योग को‌-ऑपरेटिव सेक्टर के लिये अधिक उपयुक्त है।


🔹 हाल के वर्षों में चीनी उद्योग दक्षिण की ओर शिफ्ट कर रहा है। ऐसा विशेष रूप से महाराष्ट्र में हो रहा है। इस क्षेत्र में पैदा होने वाले गन्ने में शर्करा की मात्रा अधिक होती है। इस क्षेत्र की ठंडी जलवायु से गन्ने की पेराई के लिये अधिक समय मिल जाता है।


✳️ चीनी उद्योग की चुनौतियाँ :- 


🔹 इस उद्योग की मुख्य चुनौतियाँ हैं; इसका मौसमी होना, उत्पादन का पुराना और कम कुशल तरीका, यातायात में देरी और खोई (baggage) का अधिकतम इस्तेमाल न कर पाना।


✳️ खनिज पर आधारित उद्योग :-


✳️ लोहा इस्पात उद्योग :-


🔹 लोहा इस्त्पात उद्योग एक आधारभूत उद्योग है क्योंकि लोहे का इस्तेमाल मशीनों को बनाने में होता है। इस कारण से स्टील के उत्पादन और खपत को किसी भी देश के विकास के सूचक के रूप में लिया जाता है।


🔹 भारत में कच्चे इस्पाद का उत्पादन 32.8 मिलियन टन है और विश्व में इसका 9वाँ स्थान है। भारत स्पॉंज लोहे का सबसे बड़ा उत्पादक है। लेकिन भारत में प्रति व्यक्ति इस्पात की खपत केवल 32 किग्रा प्रति वर्ष है।


🔹 अभी भारत में 10 मुख्य संकलित स्टील प्लांट हैं। इनके अलावा कई छोटे प्लांट भी हैं। इस सेक्टर में स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड एक मुख्य पब्लिक सेक्टर कंपनी है। प्राइवेट सेक्टर की मुख्य कम्पनी है टाटा आयरन एंड स्टील कम्पनी।


🔹 भारत में ज्यादातर लोहा इस्पात उद्योग छोटानागपुर के पठारी क्षेत्र में केंद्रित है। इस क्षेत्र में सस्ता लौह अयस्क, उच्च क्वालिटी का कच्चा माल, सस्ते मजदूर और रेल और सड़क से अच्छा संपर्क है।


✳️ भारत में लोहा इस्पात उद्योग के खराब प्रदर्शन के कारण :-


🔹 कोकिंग कोल की सीमित उपलब्धता और ऊँची कीमत


🔹 श्रमिकों की कम उत्पादकता


🔹 अनियमित विद्युत सप्लाई


🔹 अविकसित अवसंरचना


✳️ अलमुनियम प्रगलन :-


🔹 भारत में अलमुनियम प्रगलन दूसरा सबसे महत्वपूर्ण धातु शोधन उद्योग है। अलमुनियम को अक्सर मिश्रधातु में बदला जाता है। अलमुनियम के मिश्रधातु का इस्तेमाल विभिन्न उत्पादों के निर्माण में किया जाता है।


🔹 भारत में अलमुनियम प्रगलन के आठ प्लांट हैं। ये उड़ीसा (नालको और बालको), पश्चिम बंगाल, केरल, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और तामिलनाडु में हैं। 2004 में भारत में 600 मिलियन टन अलमुनियम का उत्पादन हुआ था।


✳️ रसायन उद्योग :-


🔹 भारत के सकल घरेलू उत्पाद में रसायन उद्योग का शेअर 3% है। भारत का रसायन उद्योग का एशिया में तीसरे नम्बर पर है और विश्व में बारहवें नम्बर पर है।


✳️ अकार्बनिक रसायन :- सल्फ्यूरिक एसिड, नाइट्रिक एसिड, अल्काली, सोडा ऐश और कॉस्टिक सोडा अकार्बनिक रसायन हैं। सल्फ्यूरिक एसिड का इस्तेमाल उर्वरक, सिंथेटिक फाइबर, प्लास्टिक, एढ़ेसिव, पेंट और डाई बनाने में किया जाता है। सोडा ऐश का इस्तेमाल काँच, साबुन, डिटर्जेंट, कागज, आदि बनाने में होता है।


✳️ कार्बनिक रसायन :- पेट्रोकेमिकल इस श्रेणी में आता है। पेट्रोकेमिकल का इस्तेमाल सिंथेटिक फाइबर, सिंथेटिक रबर, प्लास्टिक, डाई, दवा, आदि बनाने में होता है। कार्बनिक रसायन की फैक्टरियाँ तेल रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल प्लांट के आस पास मौजूद हैं।


👉  रसायन उद्योग ही अपना सबसे बड़ा ग्राहक होता है।


✳️ उर्वरक उद्योग :-


🔹 उर्वरक उद्योग में मुख्य रूप से नाइट्रोजन युक्त उर्वरक, फॉस्फ़ेटिक उर्वरक, अमोनियम फॉस्फेट और कॉम्प्लेक्स उर्वरक का उत्पादन होता है। कॉम्प्लेक्स उर्वरक में नाइट्रोजन, फॉस्फेट और पोटाश का समावेश होता है। भारत के पास वाणिज्यिक रूप से इस्तेमाल लायक पोटाश या पोटैशियम उत्पाद के भंडार नहीं हैं। इसलिई भारत को पोटाश का आयात करना पड़ता है।


🔹 भारत नाइट्रोजन युक्त उर्वरक का विश्व का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। यहाँ 57 खाद कारखाने हैं जहाँ नाइट्रोजन युक्त उर्वरक और कॉम्प्लेक्स उर्वरक का उत्पादन होता है। उनमें से 29 कारखानों में यूरिया का उत्पादन होता है और 9 कारखानों में बाइप्रोडक्ट के रूप में अमोनियम सल्फेट का उत्पादन होता है। यहाँ 68 छोटे कारखाने हैं जो सिंगल सुपरफॉस्फेट बनाते हैं।


✳️ सीमेंट उद्योग :-


🔹 सीमेंट उद्योग में भारी कच्चा माल लगता है; जैसे चूना पत्थर, सिलिका, एल्यूमिना और जिप्सम। गुजरात में सीमेंट के कई कारखाने हैं क्योंकि वहाँ बंदरगाह नजदीक है।


🔹 भारत में सीमेंट के 128 बड़े और 323 छोटे कारखाने हैं।


🔹 क्वालिटी में सुधार के बाद से भारत के सीमेंट को पूर्वी एशिया, गल्फ देशों, अफ्रिका और दक्षिण एशिया में अच्छा बाजार मिल गया है। उत्पादन और निर्यात के मामले में यह उद्योग अच्छा प्रदर्शन कर रहा है।


✳️ मोटरगाड़ी उद्योग :-


🔹 आज भारत में लगभग हर प्रकार की मोटरगाड़ी बनती है। 1991 की उदारवादी नीतियों के बाद कई मोटरगाड़ी कम्पनियों ने भारत में काम शुरु कर दिया। आज का भारत मोटरगाड़ी के लिए अच्छा बाजार बन गया है। अभी भारत में कार और मल्टी यूटिलिटी वेहिकल के 15 निर्माता, कॉमर्सियल वेहिकल के 9 निर्माता और दोपहिया वाहन के 15 निर्माता हैं। मोटरगाड़ी उद्योग के मुख्य केंद्र हैं दिल्ली, गुड़गाँव, मुम्बई, पुणे, चेन्नई, कोलकाता, लखनऊ, इंदौर, हैदराबाद, जमशेदपुर, बंगलोर, सानंद, पंतनगर, आदि।


✳️ सूचना प्रौद्योगिकी और इलेक्ट्रॉनिक उद्योग :-


🔹 सूचना प्रौद्योगिकी और इलेक्ट्रॉनिक उद्योग का मुख्य केंद्र बंगलोर है। इस उद्योग के अन्य मुख्य केंद्र हैं मुम्बई, पुणे, दिल्ली, हैदराबाद, चेन्नई, कोलकाता, लखनऊ और कोयम्बटूर। देश में 18 

सॉफ्टवेयर टेक्नॉलोजी पार्क हैं। ये सॉफ्टवेयर विशेषज्ञों को एकल विंडो सेवा और उच्च डाटा संचार की सुविधा देते है।

🔹 इस उद्योग ने भारी संख्या में रोजगार प्रदान किये है। 31 मार्च 2005 तक 10 लाख से अधिक लोग सूचना प्रौद्योगिकी में कार्यरत हैं। हाल के वर्षों में बीपीओ में तेजी से वृद्धि हुई है। इसलिये इस सेक्टर से विदेशी मुद्रा की अच्छी कमाई होती है।


✳️ औद्योगिक प्रदूषण तथा पर्यावरण निम्नीकरण :-


🔹 यद्यपि उद्योगों की हमारी अर्थ व्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका है पर यह प्रदूषण को भी बढावा देते है । 


✳️ वायु प्रदूषण :- अधिक अनुपात में गैसों की उपस्थिति सल्फर डाइऑक्साइड तथा कार्बन मोनोऑक्साइड वायु प्रदूषण का कारण है । वायु में निलंबित कणनुमा पदार्थ , घूले , स्प्रे , कुहासा तथा धुआँ । वायु प्रदूषण मानव स्वास्थ्य पशुओं पौधों , इमारत तथा पूरे पर्यावरण पर दुष्प्रभाव डालती है । 


✳️ जल - प्रदूषण :- उद्योगों द्वारा कार्बनिक तथा अकार्बनिक अपशिष्ट पदार्थों के नदी में छोडने से जल प्रदूषण फैलता है । कुछ उद्योग है जो रंग अपमार्जक अम्ल , लवण तथा भारी धातुएँ , कृत्रिम रसायन आदि जल में वांछित करते है । 


✳️ तापीय प्रदूषण :- परमाणु ऊर्जा संयत्रों के अपशिष्ट व परमाणु शस्त्रा उत्पादक कारखानों से केंसर जन्मजात विकार तथा अकाल प्रसव जैसी बिमारियां होती है । 


✳️ ध्वनि प्रदूषण :- ध्वनि प्रदूषण से खिन्नता तथा उत्तेजना ही नही बरन् श्रवण असक्षमता , हदयगति , रक्तचाप तथा अन्य कायिक व्यथाएँ भी बढ़ती है । 


✳️ उद्योग द्वारा पर्यावरण को होने वाले नुकसान की रोकथाम :-


🔹 जल का पुन : चक्रीकरण होना चाहिए। जल के पुन:चक्रीकरण से ताजे पानी के इस्तेमाल को कम किया जा सकता है।


🔹 वर्षाजल संग्रहण पर जोर देना चाहिए।


🔹 गरम पानी और अपशिष्टों को समुचित उपचार के बाद ही नदियों और तालाबों में छोड़ना चाहिए।