10 Class social science Geography Notes in hindi chapter 3 Water Resources अध्याय - 3 जल संसाधन

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10 Class social science Geography Notes in hindi chapter 3 Water Resources अध्याय - 3 जल संसाधन

CBSE Revision Notes for CBSE Class 10 Social Science GEO Water Resources (Only Maps) GEO Water Resources: Sources, distribution, utilisation, multi-purpose projects, water scarcity, need for conservation and management, rainwater harvesting. (One case study to be introduced)

Class 10th social science Geography chapter 3 Water Resources Notes in Hindi 


📚 अध्याय - 3 📚
👉 जल संसाधन 👈

✳️ जल : कुछ रोचक तथ्य :-

👉 पृथ्वी पर उपलब्ध कुल जल का 97.5 % समुद्र और सागरों में पाया जाता है । 

👉 पूरे जल का लगभग 2.5 % ताजे पानी के रूप में उपलब्ध है । 

👉 कुल ताजे पानी का 70 % आइसबर्ग और ग्लेशियर में जमी हुई बर्फ के रूप में मौजूद है । 

👉 कुल ताजे पानी का 30 % से थोड़ा कम हिस्सा भूमिगत जल के रूप में संचित है ।

👉 पूरे विश्व की कुल वर्षा का 4 % हिस्सा भारत में होता है । 

👉 प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष जल की उपलब्धता के मामले में भारत का विश्व में 133 वाँ स्थान है । 

👉 भारत में पुन : चक्रीकरण के लायक जल संसाधन 1,897 वर्ग किमी प्रति वर्ष है । 

👉 ऐसा अनुमान है कि 2025 तक भारत उन क्षेत्रों में शामिल हो जायेगा जहाँ पानी की भारी कमी है ।


✳️ प्राचीन भारत में जलीय कृतियाँ :-


🔹 इलाहाबाद के नजदीक श्रिग्विरा में गंगा नदी की बाढ़ के जल को सुरक्षित करने के लिए जल संग्रहण तंत्र । 


🔹 चंद्रगुप्त मौर्य के समय बाँध , झील और सिंचाई तंत्रों का निर्माण ।


🔹 कलिंग , नागार्जुन कोडा , बेन्नुर और कोल्हापुर में सिंचाई तंत्र । 

🔹 कृत्रिम झील - भोपाल झील , 11 वीं शताब्दी में बनाई गई । 

🔹 इल्तुतमिश ने दिल्ली में सिरी फोर्ट क्षेत्र में जल की सप्लाई के लिए हौज़ खास बनवाया ।


✳️ जल दुर्लभता :-


🔹 जल की दुर्लभता के मुख्य कारण हैं; जल का अत्यधिक दोहन, अत्यधिक इस्तेमाल और विभिन्न सामाजिक समूहों में असमान वितरण।


🔹 जल हमारे जीवन के लिये अत्यंत जरूरी होता है। हमारे दैनिक कामों के अलावा अधिकतर आर्थिक क्रियाओं के लिये भी जल की आवश्यकता होती है। जनसंख्या बढ़ने के साथ साथ जल की मांग भी बढ़ रही है। लेकिन भूमिगत जल का प्राकृतिक तरीके से रिचार्ज अब कई कारणों से बाधित होने लगा है।


🔹 हमारे जंगल तेजी से कट रहे हैं। तेजी से होने वाले वनोन्मूलन के कारण भूमिगत जल के प्राकृतिक रिचार्ज में कमी आई है। जमीन के ऊपर कंक्रीट के मकान, कारखाने और सड़कें बनने से जमीन की जल सोखने की क्षमता कम हुई है। इसलिये अब वर्षा के पानी का जमीन के अंदर रिसाव कम हो गया है और भूमिगत जल ठीक से रिचार्ज नहीं हो पा रहा है।


🔹 कई स्थानों पर भूमिगत जल इसलिये प्रदूषित हो गया है कि वहाँ पर रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक इस्तेमाल हुआ है। कई स्थानों पर भूमिगत जल इतना प्रदूषित हो चुका है कि वह अब हमारे इस्तेमाल लायक नहीं बचा है।


🔹 नाले का पानी अक्सर बिना सुचारु उपचार किये ही नदियों और तालाबों में बहा दिया जाता है। इससे नदियों और तालाबों का पानी प्रदूषित हो चुका है।


✳️ जल संसाधन प्रबंधन :-


🔹 भारत में सदियों से जल संसाधन के समुचित प्रबंधन के लिये तरह तरह की संरचनाएँ बनाई जाती रही हैं। सिंचाई प्रणाली तो मौर्य साम्राज्य से पहले से ही बनने लगी थीं।


🔹 आधुनिक भारत में अनेक बहुद्देशीय बांध परियोजनाएँ बनी हैं। इस तरह की परियोजनाएँ कई जरूरतों को पूरा करती हैं। ये पानी के बहाव को काबू में करती हैं और बाढ़ की रोकथाम करती हैं। इन बांधों के पानी को नहरों के तंत्र के द्वारा दूर दराज के गांवों में भेजा जाता है ताकि वहाँ खेतों की सिंचाई हो सके। इनसे पीने के पानी की आपूर्ति भी की जाती है।


🔹 लेकिन बड़े बांध बनाने के लिये कई एकड़ जमीन खाली करानी पड़ती है। बांध के बहाव क्षेत्र में आने वाली जमीन का एक बडा हिस्सा डूब जाता है। ऐसे क्षेत्र के लोगों को अपने जमीन से बेदखल होने को बाध्य होना पड़ता है। जमीन के जलमग्न होने से पर्यावरण पर भीषण समस्या आ जाती है। इसलिये कई लोगों ने बांधों के खिलाफ आवाज उठानी शुरु कर दी है। नर्मदा बचाओ आंदोलन ऐसा ही एक आंदोलन है।



✳️ बाँध :-

🔹 बाँध बहते जल को रोकने , दिशा देने , बहाव कम करने के लिए खड़ी की गई बाधा है जो आमतौर पर जलाशय , झील अथवा जलभरण बनाती है । 


🔹 बाँधों का वर्गीकरण उनकी संरचना और उद्देश्य या ऊँचाई के अनुसार । 


🔹 संरचना और उनमें प्रयुक्त पदार्थों के आधार पर बाँधों को लकड़ी के बाँध , तटबंध बाँध या पक्का बाँध में विभाजन ।


🔹 ऊँचाई के अनुसार बाँध को बड़े बाँध और मुख्य बाँध या नीचे बाँध , माध्यम बाँध और उच्च बाँधों में वर्गीकृत ।


✳️ वर्षा जल संग्रहण :-


🔹 वर्षा का अधिकांश जल जमीन में प्रवेश नहीं कर पाता है और बेकार में बह जाता है। इस बरबादी को वर्षाजल संग्रहण के द्वारा रोका जा सकता है। वर्षाजल संग्रहण से जमा हुए जल को भविष्य में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसे भूमिगत जल को रिचार्ज करने में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। छोटे पैमाने पर छत वर्षाजल संग्रहण भी कारगर साबित होता है।


🔹 राजस्थान में टाँका बनाने की पुरानी परंपरा रही है। यह एक भूमिगत टंकी होती है जिसमें वर्षाजल संग्रहण किया जाता है। इस जल को गर्मी के दिनों में इस्तेमाल किया जाता है।


✳️3. वर्षा जल संग्रहण तरीके :- 


🔹 पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में लोगों ने गुल अथवा कुल जैसी वाहिकाएँ बनाई । 


🔹 गुल या कुल में नदी की धारा का रास्ता बदला जाता था । छत वर्षा जल संग्रहण करना । 


🔹 बाढ़ जल बाहिकाएँ बनाना । - गढ्ढे बनाना । 


🔹  राजस्थान के ज़िले जैसलमेर में खादीन और जोहड़ बनाना । टाँका या भूमिगत टैंक - पीने का पानी संग्रहित करने के . लिए । . . . बीकानेर , फलोदी और बाड़मेर में । 


🔹 आकार एक कमरे जितना ।


🔹  छत का पानी पीने के लिए संग्रहित । 


🔹 वर्षा का पहला जल छत और नलों को साफ करने में उपयोग । वर्षा जल को पालर पानी कहना ।


🔹 टाँकों के साथ भूमिगत कमरे गर्मी से राहत देते थे । 


🔹 कुछ घरों में टाँका आज भी मौजूद क्योंकि नल के पानी का उन्हें स्वाद पसंद नहीं । 


🔹 गंडायूर गाँव में छत वर्षा जल संग्रहण