10 Class social science Geography Notes in hindi chapter 2 Forest and Wildlife Resources अध्याय - 2 वन और वन्य जीव संसाधन

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10 Class social science Geography Notes in hindi chapter 2 Forest and Wildlife Resources अध्याय - 2 वन और वन्य जीव संसाधन

CBSE Revision Notes for CBSE Class 10 Social Science GEO Forest and Wildlife Resources GEO Forest and Wildlife Resources: Types and distribution, depletion of flora and fauna; conservation and protection of forest and wild life.

Class 10th social science Geography chapter 2 Forest and Wildlife Resources Notes in Hindi 


📚 अध्याय - 2 📚
👉 वन और वन्य जीव संसाधन 👈


👉 भारत में वनों का वितरण बड़ा सामान है । इसमें कई राज्यों में इनका वितरण बड़ा घना और कई में बड़ा विरल है।हरियाणा में कुल क्षेत्र में केवल 3.8 % भूभाग पर ही वन है । वहीं अंडमान और निकोबार जैसे ऐसे प्रदेश हैं जिनका लगभग 86.9 % भूभाग वनों से ढंका पड़ा है । एक अनुमान के अनुसार जब कि अरुणाचल प्रदेश मणिपुर मिजोरम करानेवाला निकोबार दीप समूहों में 60 % से अधिक भू भाग पर बन है परन्तु हरियाणा पंजाब राजस्थान गुजरात जम्मू कश्मीर और दिल्ली आदि राज्यों के 10 % से भी कम भू भाग पर वन है । वैसे देश के अधिकतर भागों में वनों के अधीन क्षेत्र कम ही हैं राष्ट्रीय वन नीति के अधीन 33 % भू भाग पर बन होने चाहिए । 

✳️ राष्ट्रीय उद्यान :- 

🔹 राष्ट्रीय उद्यान ऐसे लक्षित क्षेत्रों को कहते हैं जहां बने प्राणियों से प्राकृतिक वनस्पति और प्राकृतिक सुंदरता को एक साथ सुरक्षित रखा जाता है । ऐसे स्थानों की सुरक्षा और प्रबंध की ओर सबसे अधिक ध्यान दिया जाता है इनमें बहुत कम मानव हस्तक्षेप होता है। सिवाय इसके कि अधिकारी वर्ग आ जा सकते हैं और अपने काम की देखभाल कर सकें । सैलानियों को भी एक नियमित बोलकर नियंत्रित संख्या में जाने दिया जाता है । भारत का राष्ट्रीय पक्षी मोर है और चीता भारत का राष्ट्रीय पशु है ।

✳️ जैव विविधता :-

🔹 किसी भी क्षेत्र में पाए जाने वाले जंतुओं और पादपों की विविधता को उस क्षेत्र की जैव विविधता कहते हैं । 

✳️ भारत के वनस्पतिजात और प्राणिजात :-

🔹 जैव विविधता के मामले में भारत एक संपन्न देश है । विश्व की लगभग 16 लाख प्रजातियों में से लगभग 8 % प्रजातियाँ भारत में पाई जाती हैं । 

✴️ लुप्तप्राय प्रजातियाँ जो नाजुक अवस्था में हैं :- चीता , गुलाबी सिर वाली बतख , पहाड़ी कोयल , जंगली चित्तीदार उल्लू , महुआ की जंगली किस्म , हुबर्डिया हेप्टान्यूरॉन ( घास की एक प्रजाति ) , आदि । 

✴️ लुप्तप्राय प्रजातियों की संख्या :- 79 स्तनधारी , 44 पक्षी , 15 सरीसृप , 3 उभयचर , और 1,500 पादप प्रजातियाँ ।

✳️ अंतर्राष्ट्रीय संरक्षण और प्राकृतिक संसाधन संरक्षण संघ (IUCN) के अनुसार प्रजातियों का वर्गीकरण:-

✴️ सामान्य प्रजातियाँ :- जिस प्रजाति की जनसंख्या जीवित रहने के लिये सामान्य हो तो उस प्रजाति को सामान्य प्रजाति कहते हैं। उदाहरण: मवेशी, साल, चीड़, कृन्तक, आदि।

✴️ संकटग्रस्त प्रजातियाँ :- जो प्रजाति लुप्त होने के कगार पर हो उसे संकटग्रस्त प्रजाति कहते हैं। उदाहरण: काला हिरण, मगरमच्छ, भारतीय जंगली गधा, भारतीय गैंडा, शेर-पूँछ वाला बंदर, संगाई (मणिपुरी हिरण), आदि।

✴️ सुभेद्य (Vulnerable) प्रजातियाँ :- जब किसी प्रजाति की जनसंख्या इतनी कम हो जाये कि उसके लुप्त होने की प्रबल संभावना हो जाये तो उसे सुभेद्य प्रजाति कहते हैं। उदाहरण: नीली भेड़, एशियाई हाथी, गंगा की डॉल्फिन, आदि।

✴️ दुर्लभ प्रजातियाँ :- जब किसी प्रजाति की संख्या इतनी कम हो जाये कि उसके संकटग्रस्त या सुभेद्य होने का खतरा उत्पन्न हो तो उसे दुर्लभ प्रजाति कहते हैं। उदाहरण: हिमालय के भूरे भालू, एशियाई भैंस, रेगिस्तानी लोमड़ी, हॉर्नबिल, आदि।

✴️ स्थानीय प्रजातियाँ :- कुछ प्रजाति केवल किसी खास भौगोलिक क्षेत्र में पाई जाती है। ऐसी प्रजाति को उस क्षेत्र की स्थानीय प्रजाति कहते हैं। उदाहरण: अंदमान टील, निकोबार के कबूतर, अंदमान के जंगली सूअर, अरुणाचल प्रदेश के मिथुन, आदि।

✴️ लुप्त प्रजातियाँ :- प्रजाति जो अब नहीं पाई जाती है; लुप्त प्रजाति कहलाती है। कोई कोई प्रजाति किसी खास स्थान, क्षेत्र, देश, महादेश या पूरी धरती से विलुप्त हो जाती है। उदाहरण: एशियाई चीता, गुलाबी सिरवाली बतख, आदि।

✳️ वनस्पतिजात और प्राणिजात के ह्रास के कारण :-

✴️ कृषि में विस्तार :- भारतीय वन सर्वेक्षण के आँकड़े के अनुसार 1951 से 1980 के बीच 262,000 वर्ग किमी से अधिक के वन क्षेत्र को कृषि भूमि में बदल दिया गया। इसके साथ ही आदिवासी क्षेत्रों के एक बड़े भूभाग को झूम खेती और पेड़ों की कटाई से नुकसान पहुँचा है।

✴️ संवर्धन वृक्षारोपण :- जब व्यावसायिक महत्व के किसी एक प्रजाति के पादपों का वृक्षारोपण किया जाता है तो इसे संवर्धन वृक्षारोपण कहते हैं। भारत के कई भागों में संवर्धन वृक्षारोपण किया गया ताकि कुछ चुनिंदा प्रजातियों को बढ़ावा दिया जा सके। इससे अन्य प्रजातियों का उन्मूलन हो गया।

✴️ विकास परियोजनाएँ :- आजादी के बाद से बड़े पैमाने वाली कई विकास परियोजनाओं को मूर्तरूप दिया गया। इससे जंगलों को भारी क्षति का सामना करना पड़ा। 1951 से आजतक नदी घाटी परियोजनाओं के कारण 5,000 वर्ग किमी से अधिक वनों का सफाया हो चुका है।

✴️ खनन :- खनन से कई क्षेत्रों में जैविक विविधता को भारी नुकसान पहुँचा है। उदाहरण: पश्चिम बंगाल के बक्सा टाइगर रिजर्व में डोलोमाइट का खनन।

✴️ संसाधनों का असमान बँटवारा :- अमीर और गरीबों के बीच संसाधनों का असमान बँटवारा होता है। इससे अमीर लोग संसाधनों का दोहन करते हैं और पर्यावरण को अधिक नुकसान पहुँचाते हैं।

✳️ कम होते संसाधनों के सामाजिक प्रभाव :-

🔹 संसाधनों के कम होने से समाज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ते हैं। कुछ चीजें इकट्ठा करने के लिये महिलाओं पर अधिक बोझ होता है; जैसे ईंधन, चारा, पेयजल और अन्य मूलभूत चीजें। इन संसाधनों की कमी होने से महिलाओं को अधिक काम करना पड़ता है। कुछ गाँवों में पीने का पानी लाने के लिये महिलाओं को कई किलोमीटर पैदल चलकर जाना होता है।

🔹 वनोन्मूलन से बाढ़ और सूखा जैसी प्राकृतिक विपदाएँ बढ़ जाती हैं जिससे गरीबों को काफी कष्ट होता है।

🔹 वनोन्मूलन से सांस्कृतिक विविधता में भी कमी आती है। कुछ लोग अपने पारंपरिक तौर तरीकों से जीवनयापन करने लिये वनों पर निर्भर रहते थे। ऐसे लोगों को वनोन्मूलन के कारण जीविका के नये साधनों की तलाश में निकलना पड़ता है। इस प्रक्रिया में उनकी जड़ें छूट जाती हैं और उन्हें अपने पारंपरिक आवास और संस्कृति को छोड़ने को विवश होना पड़ता है।

✳️ वन्यजीव संरक्षण

✳️ भारतीय वन्यजीवन (रक्षण) अधिनियम 1972 :-

🔹 1960 और 1970 के दशकों में पर्यावरण संरक्षकों ने वन्यजीवन की रक्षा के लिए नए कानून की माँग की थी। उनकी माँगों को मानते हुए सरकार ने भारतीय वन्यजीवन (रक्षण) अधिनियम 1972 को लागू किया। इस अधिनियम के तहत संरक्षित प्रजातियों की एक अखिल भारतीय सूची तैयार की गई। बची हुई संकटग्रस्त प्रजातियों के शिकार पर पाबंदी लगा दी गई। वन्यजीवन के व्यापार पर रोक लगाया गया। वन्यजीवन के आवास को कानूनी सुरक्षा प्रदान की गई। कई राज्य सरकारों और केंद्र सरकारों ने नेशनल पार्क और वन्यजीवन अभयारण्य बनाए। कुछ खास जानवरों की सुरक्षा के लिए कई प्रोजेक्ट शुरु किये गये, जैसे प्रोजेक्ट टाइगर।

✳️ संरक्षण के लाभ :-

🔹 संरक्षण से कई लाभ होते हैं। इससे पारिस्थितिकी की विविधता को बचाया जा सकता है। इससे हमारे जीवन के लिये जरूरी मूलभूत चीजों (जल, हवा, मिट्टी) का संरक्षण भी होता है।

✳️ सरकार द्वारा वनों का वर्गीकरण :-

✴️ आरक्षित वन :- जिस वन में शिकार और मानव गतिविधियों पर पूरी तरह प्रतिबंध हो उसे आरक्षित वन कहते हैं। कुल वन क्षेत्र के आधे से अधिक को आरक्षित वन का दर्जा दिया गया है। संरक्षण की दृष्टि से इन्हें सबसे बहुमूल्य माना जाता है।

✴️ रक्षित वन :- जिस वन में शिकार और मानव गतिविधियों पर प्रतिबंध हो लेकिन यह उस वन पर निर्भर रहने वाले आदिवासियों पर लागू न हो तो ऐसे वन को रक्षित वन कहते हैं। कुल वन क्षेत्र के एक तिहाई हिस्से को रक्षित वन का दर्जा दिया गया है। रक्षित वनों को आगे होने वाले नुकसान से बचाया जाता है।

✴️ अवर्गीकृत वन :- जो वन ऊपर की दो श्रेणी में नहीं आते हैं उन्हें अवर्गीकृत वन कहा जाता है।

👉🔷संरक्षण नीति की नई परिपाटी🔷👈

✴️ जैव विविधता को बढ़ाना :- अब कुछ गिने चुने कारकों पर ध्यान देने की बजाय पूरी जैव विविधता पर ध्यान दिया जाता है। इसका असर यह हुआ है कि अब न केवल बड़े स्तनधारियों पर ध्यान दिया जाता है बल्कि कीटों पर भी ध्यान दिया जाने लगा है। 1980 और 1986 के वन्यजीवन अधिनियम के बाद नई अधिसूचनाएँ जारी की गईं। इन अधिसूचनाओं के अनुसार अब कई सौ तितलियों, मॉथ, बीटल और एक ड्रैगनफ्लाई को भी रक्षित जीवों की श्रेणी में रखा गया। 1991 में इस लिस्ट में पादप की छ: प्रजातियों को भी रखा गया है।

✳️ समुदाय और संरक्षण :-

🔹 इस बात को अब कई स्थानीय समुदायों ने भी मान लिया है कि संरक्षण से उनके जीवनयापन को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। इसलिए अब कुछ लोग कई जगहों पर सरकार के संरक्षण के प्रयासों के साथ भागीदारी कर रहे हैं।

🔹 राजस्थान के सरिस्का टाइगर रिजर्व में गाँव के लोगों ने खनन के खिलाफ लड़ाई लड़ी है।

🔹 कई गाँव के लोग तो अब वन्यजीवन के आवास की रक्षा करने के क्रम में सरकारी हस्तक्षेप की भी अनदेखी कर रहे हैं। इसका एक उदाहरण अलवर जिले में देखने को मिलता है। इस जिले के पाँच गाँवों ने 1,200 हेक्टेअर वन को भैरोदेव डाकव ‘सोनचुरी’ घोषित कर दिया है। वहाँ के लोगों ने वन्यजीवन की रक्षा के लिये अपने ही नियम और कानून बनाये हैं।

🔹 हिंदू धर्म और कई आदिवासी समुदायों में प्रकृति की पूजा की पुरानी परंपरा रही है। जंगलों में पवित्र पेड़ों के झुरमुट इसी परंपरा की गवाही देते हैं। वनों में ऐसे स्थानों को मानव गतिविधियों से अछूता रखा जाता है।

🔹 छोटानागपुर के मुण्डा और संथाल लोग महुआ और कदम्ब की पूजा करते हैं। इसी तरह उड़ीसा और बिहार के आदिवासी शादी के मौके पर इमली और आम की पूजा करते हैं।

🔹 बंदरों को हिंदुओं के देवता हनुमान का वंशज माना जाता है। अधिकाँश स्थानों पर इसी मान्यता के कारण बंदरों और लंगूरों को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया जाता है। राजस्थान के बिश्नोई गाँवों में चिंकारा, नीलगाय और मोर को पूरे समुदाय का संरक्षण मिलता है और कोई उनको नुकसान नहीं पहुँचाता है।

🔹 संरक्षण कार्य में समुदाय की भागीदारी का एक अच्छा उदाहरण है चिपको आंदोलन।

🔹 टेहरी और नवदन्य के बीज बचाओ आंदोलन जैसे संगठनों ने यह दिखा दिया है कि रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग के बिना भी विविध अनाजों की पैदावार करना आर्थिक रूप से संभव है।

🔹 स्थानीय समुदाय द्वारा संरक्षण में भागीदारी का एक और उदाहरण है ज्वाइंट फॉरेस्ट मैनेजमेंट। यह कार्यक्रम उड़ीसा में 1988 से चल रहा है। इस कार्यक्रम के तहत गाँव के लोग अपनी संस्था का निर्माण करते हैं और संरक्षण संबंधी क्रियाकलापों पर काम करते हैं। उसके बदले में सरकार द्वारा उन्हें कुछ वन संसाधनों के इस्तेमाल का अधिकार मिल जाता है।

✳️ प्रोजेक्ट टाइगर :-

🔹 बाघों को विलुप्त होने से बचाने के लिये प्रोजेक्ट टाइगर को 1973 में शुरु किया गया था।

🔹 बीसवीं सदी की शुरुआत में बाघों की कुल आबादी 55,000 थी जो 1973 में घटकर 1,827 हो गई।

✳️ बाघ की आबादी के लिए खतरे :- व्यापार के लिए शिकार, सिमटता आवास, भोजन के लिए आवश्यक जंगली उपजातियों की घटती संख्या, आदि।

✳️ महत्वपूर्ण टाइगर रिजर्व :- कॉर्बेट नेशनल पार्क (उत्तराखंड), सुंदरबन नेशनल पार्क (पश्चिम बंगाल), बांधवगढ़ नेशनल पार्क (मध्य प्रदेश), सरिस्का वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी (राजस्थान), मानस टाइगर रिजर्व (असम) और पेरियार टाइगर रिजर्व (केरल)।

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