10 Class social science Civics Notes in hindi chapter 3 Democracy and Diversity अध्याय - 3 लोकतंत्र और विविधता

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10 Class social science Civics Notes in hindi chapter 3 Democracy and Diversity अध्याय - 3 लोकतंत्र और विविधता 

CBSE Revision Notes for CBSE Class 10 Social Science POL Democracy and Diversity (Not for Exams) POL Democracy and Diversity: Are divisions inherent to the working of democracy? How do communal divisions affect democracy?

Class 10th social science Civics chapter 3 Democracy and Diversity Notes in Hindi 


📚 अध्याय - 3 📚
👉 लोकतंत्र और विविधता 👈


✳️ समरूप समाज :- 

🔹 एक ऐसा समाज जिसमें सामुदायिक , सांस्कृतिक या जातीय विभिन्नताएँ ज्यादा गहरी नहीं होती । 

✳️ एफ्रो - अमेरिकी :-

🔹 उन अफ्रीकी लोगों की संतानें जिन्हें 17 वीं सदी में अमेरिका में लाकर गुलाम बनाया गया था । 

✳️ नस्लभेद :-

🔹  किसी देश अथवा समाज में नस्ल के आधार पर कुछ लोगों को नीच या हीन समझना ।

✳️ रंगभेद :-

🔹 रंग के आधार पर भेदभाव करना । 

✳️ अनु . जाति अनु . जनजाति :-

🔹 भारत के निर्धन , भूमिहीन और सामाजिक व आर्थिक रूप से पिछड़े हुए लोग । 

✳️ अश्वेत शक्ति आंदोलन :-

🔹  नस्ल आधारित भेदभाव के उन्मूलन के लिए अमेरिका में 1966 से 1975 के बीच चलाया गया हिंसक आंदोलन । 

✳️ प्रवासी :- 

🔹 अस्थाई तौर पर आर्थिक अवसरों के लिए दूसरे देशों या नगरों में जाकर बसने वाले लोग । 

✳️ विभाजित समाज :- 

🔹 एक ऐसा समाज जिसमें सामुदायिक , सांस्कृतिक या जातीय विभिन्नताएँ बहुत गहरी होती हैं । 

✳️ बहुल समाज :- 

🔹 विभिन्न विचारों एवं पंथो वाला समाज ।

✳️ अपवर्जक भेदभाव :-

🔹 समाज के किसी वर्ग या जाति से दूरी बनाए रखना या अपने समूह से निष्कासित करना । 

✳️ अलगाववाद :-

🔹 एक क्षेत्र या जन - समूह का अपने बड़े समूह या देश से अलग होकर स्वतंत्र अस्तित्व बनाने की इच्छा

✳️ समाज में विविधता :-

🔹 किसी भी समाज में विविधता तभी आती है जब उस समाज में विभिन्न आर्थिक तबके , धार्मिक समुदायों , विभिन्न भाषाई समूहों , विभिन्न संस्कृतियों और जातियों के लोग रहते हैं । 


🔹 भारत देश विविधताओं का एक जीता जागता उदाहरण है । इस देश में दुनिया के लगभग सभी मुख्य धर्मों के अनुयायी रहते हैं । यहाँ हजारों भाषाएँ बोली जाती हैं , अलग - अलग खान पान हैं , अलग - अलग पोशाक और तरह तरह की संस्कृति दिखाई देती है ।


✳️ सामाजिक विभाजन :- 


🔹 जो विभाजन क्षेत्र , जाति , रंग , नस्ल , लिंग आदि के भेद पर किया जाए उसे सामाजिक विभाजन कहते हैं । 


🔹 जब किसी सामाजिक समूह के साथ कोई घोर अन्याय किया जाता है तो यह सामाजिक अंतर सामाजिक विभाजनों का रूप ले लेते हैं जैसे अमेरिका में दोनों श्वेत और अश्वेत जातियों के लोग अमेरिका के नागरिकों के रूप में रहते हैं परन्तु यदि अश्वेत अमेरिकनो से नस्लवाद के आधार पर भेदभाव किया जाता है तो सामाजिक अंतर सामाजिक विभाजन में भी बादल जाते हैं जिसके परिणाम भयंकर हो सकते हैं । सामाजिक अंतर होना तो स्वाभाविक है परन्तु यदि उनके साथ और तत्व जुट जाते हैं तो उन्हें सामाजिक विभाजन का रूप लेते देर नहीं लगती ।


✳️ अमेरिका में नागरिक अधिकार आंदोलन ( 1954-1968 ) : -


🔹  घटनाओं और सुधार आंदोलनों का एक सिलसिला जिनका उद्देश्य एफ्रो - अमेरिकन लोगों के विरुद्ध होने वाले नस्ली भेदभाव को मिटाना था । 


✳️ एफ्रो - अमेरिकी :-


🔹  यह शब्द उन अफ्रीकी लोगों के वंशजों के लिए प्रयुक्त होता है जिन्हें 17 वि शताब्दी से 19 वि शताब्दी की शुरुआत तक गुलाम बनाकर अफ्रीका से लाया गया था । एफ्रो अमेरिकन काले अमेरिकी या काले अफ्रीकियों के वंशज हैं । 


✳️ अश्वेत शक्ति आंदोलन ( 1966-1975 ) :-


🔹 यह आंदोलन काले अमेरिकी या एस्ट्रो अमेरिकन लोगों ने शुरू किया गया था यह अमेरिका के नस्लभेद को मिटाने के लिए शुरू हुआ था । इस आंदोलन में अश्वेत लोग नस्लवाद को अमेरिका से मिटाने में हिंसा के प्रयोग से भी नहीं हिचकिचा रहे थे ।


✳️ प्रवासी :- 


🔹 जो कोई भी व्यक्ति काम के तलाश में या आर्थिक प्रयोजन हेतु किसी एक देश से दूसरे देश में आता है या जाता है उसे प्रवासी कहा जाता है । 


✳️ समरूप समाज :- 


🔹 समरूप समाज का अर्थ है एक ऐसा समाज जहाँ पर सांप्रदायिकता , जाति वादिता या नस्ल भेद आदि की जडे ज्यादा गहरी ना हो । 


🔹 दो एफ्रो - अमेरीकी खिलाड़ी जो नस्लवाद की नीति के विरुद्ध 1968 मैक्सिको में होने वाले ओलंपिक मुकाबलों में अपना विरोध प्रकट कर रहे थे उनके नाम थे टॉमी स्मिथ और जान कार्लोस । ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी पीटर नॉर्मल ने भी प्रॉमिस मिथ और जान कार्लोस के पक्ष में विरोध प्रदर्शन किया ।


✳️ समानताएँ , असमानताएँ और विभाजन :-


🔹 समाजिक भेदभाव की उत्पत्ति - जन्म के आधार पर - चमड़ी के आधार पर


✳️ सामाजिक विभाजन और राजनीति :-


🔹 आपने जीव विज्ञान की कक्षा में डार्विन के क्रमिक विकास के सिद्धांत के बारे में पढ़ा होगा । इस सिद्धांत के अनुसार जो सबसे फिट होता है वही जिंदा रह पाता है । मनुष्यों को अपना जीवन सही तरीके से जीने के लिए आर्थिक रूप से तरक्की करनी होती है । जब कोई व्यक्ति आर्थिक तरक्की कर लेता है तो उसे समाज में ऊँचा स्थान मिल जाता है । हर देश के इतिहास में यह देखने को मिलता है कि आर्थिक रूप से संपन्न समूह ने आर्थिक रूप से कमजोर समूह पर शासन किया है । इससे यह सुनिश्चित हो जाता था कि संसाधन और शक्ति के स्रोतों पर किसी खास समूह का एकाधिकार कायम हो सके ।


✳️ सामाजिक विविधता का राजनीति पर परिणाम तीन बातों पर निर्भर करता है , जो निम्नलिखित हैं :-


🔹  लोग अपनी सामाजिक पहचान को किस रूप में लेते हैं इससे सामाजिक विविधता का राजनीति पर परिणाम तय होता है । यदि किसी खास समूह के लोग अपने को विशिष्ट मानने लगते हैं तो फिर वे सामाजिक विविधता को गले नहीं उतार पाते हैं । 


🔹 किसी समुदाय की मांगों को राजनेता द्वारा किस तरह से पेश किया जाता है । यह इस पर भी निर्भर करता है कि किसी समुदाय की मांग पर सरकार की क्या प्रतिक्रिया होती है । यदि सरकार किसी समुदाय की मांग को उचित तरीके से मान लेती है तो फिर उस समुदाय की राजनीति सबल हो जाती है । 


🔹 प्राचीन भारत में समाज को कार्य के आधार पर चार समूहों में बाँटा गया था । समय बीतने के साथ इन चार समूहों का स्थान जाति व्यवस्था ने ले लिया । जाति व्यवस्था में जन्म को ही किसी व्यक्ति के कर्म का आधार मान लिया जाता है । कुछ काम ऊँची जाति के लोग ही कर सकते हैं , जबकि कुछ काम केवल नीची जाति के लोगों के लिए तय होते हैं । आजादी के कुछ वर्षों पहले तक सभी आर्थिक संसाधन ऊँची जाति के लोगों के हाथों में थे । इन लोगों ने नीची जाति के लोगों को दबाकर रखा था ताकि नीची जाति के लोग सामाजिक व्यवस्था में ऊपर न उठ सकें । 


🔹 अंग्रेजी हुकूमत ने भारत में आधुनिक शिक्षा पद्धति की शुरुआत की थी । आजादी के बाद की सरकारों ने भी शिक्षा को बढ़ावा दिया । इससे पिछड़े वर्गों के लोग भी आधुनिक शिक्षा का लाभ उठाने लगे । मीडिया ने भी समाज में जागरूकता फैलाने का काम किया । धीरे - धीरे समाज के पिछड़े वर्ग के लोगों में जागरूकता फैलने लगी । इसके दूरगामी परिणाम हुए हैं । 


🔹 आज लगभग हर क्षेत्र में नीची जाति के लोगों का प्रतिनिधित्व देखने को मिलता है । आज नीची जाति के लोग ऊँचे पदों पर आसीन दिखते हैं । आज सरकारी तंत्र में समाज के लगभग हर वर्ग का प्रतिनिधित्व दिखाई देता है । इससे यह पता चलता है कि समाज के हर वर्ग को सत्ता में साझेदारी मिलने लगी है । भारत एक मजबूत लोकतंत्र बनने की दिशा में अग्रसर है ।


✳️ हासिये पर खड़े लोगों को मुख्यधारा में जोड़ने के लिये सरकार के प्रयास :-


🔹 आजादी के बाद संविधान में दो ऐसे अहम प्रावधान किये गये जो भारत को सही दिशा में ले जा सकें । 


👉 पहला प्रावधान था देश के हर वयस्क नागरिक को मताधिकार देना । उस जमाने में कई जानकारों ने इस बात की हँसी उड़ाई थी । उनका मानना था कि अशिक्षित लोगों में इतना विवेक नहीं हो सकता कि वे अपने मताधिकार का सही उपयोग कर पाएँ । लेकिन गांधीजी का मानना था कि यदि कोई आदमी इतना विवेकपूर्ण हो सकता है कि अपने परिवार का भरण - पोषण कर ले तो फिर उसमें सरकार चुनने लायक विवेक भी अवश्य ही होगा । 


👉 दूसरा प्रावधान था अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति के लोगों को आरक्षण देना ताकि उन्हें राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ा जा सके । आज एक दलित का बेटा भी आइआईएम और आइआइटी जैसी शिक्षण संस्थानों से शिक्षा प्राप्त कर पाता है और भारतीय प्राशासनिक सेवा में कार्य कर पाता है । यह सब आरक्षण के कारण ही संभव हो पाया है । 


🔹 इसका सही महत्व समझने के लिए हमें विश्व के अन्य देशों के उदाहरणों को देखना होगा । यूरोप के देशों में महिलाओं को मताधिकार मिलने में कई सौ साल लग गये थे । अमेरिका जैसे अति विकसित देश में भी आज तक कोई महिला राष्ट्रपति नहीं बन पाई है । बारक ओबामा से पहले तक कोई भी अश्वेत अमेरिका का राष्ट्रपति नहीं बन पाया था ।


🔹  हमारे देश में लाखों समस्याओं के बावजूद अल्पसंख्य समुदाय और दलित समुदाय के लोग ऊँचे पदों पर पहुँच चुके हैं । भारत में महिला प्रधानमंत्री और महिला राष्ट्रपति भी बन चुकी हैं । भारत के राष्ट्रपति के पद पर सिख , मुसलमान और दलित भी आसीन हो चुके हैं । सिख समुदाय से एक व्यक्ति तो प्रधानमंत्री भी रह चुके हैं ।


✳️ 4. सामाजिक विभाजनों के राजनीतिक तय करने वाले तीन कारक :-


👉 1 .  पहला फरक है लोगों में राज्य पहचान की भावना के प्रति विश्वास जिसके परिणाम स्वरूप लोग अपने सामाजिक विभाजन को पीछे रखते हुए राष्ट्रीय पहचान को पहले रखते हैं । ऐसे में कोई समस्या पैदा नहीं होती । जैसे बर्जन के लोग अपने आपको डच , फ्रेंच या जर्मन न मानते हुए अपने आपको बेलजियाइ मानते हैं भले ही वे डच , फ्रेंच या जर्मन भाषा में बोलते हैं ऐसे में कोई समस्या नहीं है ऐसा सोचने मे उन्हें साथ साथ रहने में मदद मिलेगी । 


👉 2 . सामाजिक विभाजन की राजनीति को प्रभावित करने वाला दूसरा कारक है राजनीतिक दलों के संविधान के दायरे में रहकर कार्य करना और दूसरे समुदाय को नुकसान पहुंचाने वाली किसी मांग को न उठाना । यदि श्रीलंका की भांति एक ही सामाजिक वर्ग अर्थात सिहलियों के हितों की बात ही की जाएगी और दूसरे सामाजिक वर्ग था तमिलों की अवहेलना की जाएगी तो सदा संघर्ष पूर्ण वातावरण बना रहेगा । ऐसे में राजनीतिक दलों का है कब से है कि वे सभी सामाजिक वर्गों के हितों का ध्यान रखें । 


👉 3 . तीसरे सामाजिक विभाजन की राजनीति को प्रभावित करने वाला अन्य महत्वपूर्ण कारक यह है कि सरकार विभिन्न सामाजिक वर्गों के प्रति कैसा रूप अपनाती हैं । यदि बेल्जियम की भांति सरकार के सत्ता भागीदारी पर विश्वास रखती है और प्रशासनिक तंत्र में सभी सामाजिक वर्गों को हिस्सेदार बनती है तो कोई समस्या पैदा नहीं होती । परन्तु यदि श्रीलंका या यूगोस्लाविया की भांति सरकारी यदि एक से सामाजिक वर्गों के अतिरिक्त अनेक वर्गों को शासन तंत्र से अलग रखती है तो संघर्ष , कलह , गृहयुद्ध और यहां तक कि देश का बटवारा भी हो सकता है ।

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