10 Class Science Notes in hindi chapter 8 How do Organisms Reproduce Reproduction अध्याय - 8 जीव जनन कैसे करते हैं

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10 Class Science Notes in hindi chapter 8 How do Organisms Reproduce Reproduction अध्याय - 8 जीव जनन कैसे करते हैं

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Class 10th Science chapter 8 How do Organisms Reproduce Reproduction Notes in Hindi 

📚 अध्याय - 8 📚
👉 जीव जनन कैसे करते हैं 👈
✳️ जनन :-

🔹 ( i ) जनन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा सजीव अपने जैसे नए जीव उत्पन्न करते हैं । यह पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता को बनाए रखने के लिए आवश्यक है । 

🔹 ( ii ) कोशिका के केन्द्रक में पाए जाने वाले गुणसूत्रों के डी . एन . ए . ( DNA- डिऑक्सीराइबो न्यूक्लीक अम्ल ) के अणुओं में आनुवंशिक गुण होते हैं । 

🔹 ( iii ) डी . एन . ए . ( DNA ) प्रतिकृति बनाता है तथा नई कोशिकाएँ बनाता है । इससे कोशिकाओं में विभिन्नता उत्पन्न होती है । ये नई कोशिकाएँ एकसमान हैं परन्तु समरूप नहीं ।

✳️ विभिन्नता का महत्त्व :-

🔹 ( i ) लम्बे समय तक प्रजाति ( स्पीशीज ) की उत्तर — जीविता बनाए रखने में उपयोगी । 

🔹 ( ii ) जैस विकास का आधार । 

✳️ प्रजनन के प्रकार :- 

👉 ( i ) अलैंगिक प्रजनन 

👉 ( ii ) लैंगिक प्रजनन 

✳️ ( i ) अलैंगिक प्रजनन 

🔹 एकल जीव नए जीव उत्पन्न करता है ।
🔹 युग्मक का निर्माण नहीं होता है ।
🔹 नया जीव पैतृक जीव के समान / समरूप होता है । 
🔹 सतत् गुणन के लिए यह एक बहुत ही उपयोगी माध्यम है ।
🔹 यह निम्न वर्ग के जीवों में अधिक पाया जाता है ।

✳️  ( ii ) लैंगिक प्रजनन :-

🔹  दो एकल जीव ( एक नर व एक मादा ) मिलकर नया जीव उत्पन्न करते हैं । 
🔹 नर युग्मक व मादा युग्मक बनते हैं । .
🔹 नया जीव अनुवांशिक रूप से पैतृक जीवों के समान होता है परन्तु समरूप नहीं । 
🔹 प्रजाति में विभिन्नताएँ उत्पन्न करने में सहायक होता है ।
🔹 उच्च वर्ग के जीवों में पाया जाता है । 

✳️ अलैंगिक प्रजनन की विधियाँ :-

✴️ ( i ) विखंडन — इस प्रक्रम में एक कोशिका दो या दो से अधिक कोशिकाओं में विभाजित हो जाती है । 

🔷 ( क ) द्विखंडन — जीव दो कोशिकाओं में विभाजित होता है ।
🔹 उदाहरण — अमीबा , लेस्मानिया
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🔷 ( ख ) बहुखंडन — जीव बहुत सारी कोशिकाओं में विभाजित हो जाता है । 
🔹 उदाहरण — प्लैज्मोडियम 

✴️ ( ii ) खंडन — इस प्रजनन विधि में सरल संरचना वाले बहुकोशिकीय जीव विकसित होकर छोटे - छोटे टुकड़ों में खंडित हो जाता है । ये टुकड़े वृद्धि कर नए जीव में विकसित हो जाते हैं ।
🔹 उदाहरण :- स्पाइरोगाइरा

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✴️ ( iii ) पुनरुद्भवन ( पुनर्जनन ) — इस प्रक्रम में किसी कारणवश , जब कोई जीव कुछ टुकड़ों में टूट जाता है , तब प्रत्येक टुकड़ा नए जीव में विकसित हो जाता है ।
🔹 उदाहरण — प्लेनेरिया , हाइड्रा

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✴️ ( iv ) मुकुलन — इस प्रक्रम में , जीव के शरीर पर एक उभार उत्पन्न होता है जिसे मुकुल कहते हैं । यह मुकुल पहले नन्हें फिर पूर्ण जीव में विकसित हो जाता है तथा जनक से अलग हो जाता है । 
🔹 उदाहरण हाइड्रा , यीस्ट ( खमीर )

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✴️ ( v ) बीजाणु समासंघ — कुछ जीवों के तंतुओं के सिरे पर बीजाणु धानी बनती है जिनमें बीजाणु होते हैं । बीजाणु गोल संरचनाएँ होती हैं जो एक मोटी भित्ति से रक्षित होती हैं । अनुकूल परिस्थिति मिलने पर बीजाणु वृद्धि करने लगते हैं ।

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✴️ ( vi ) कायिक प्रवर्धन — कुछ पौधों में नए पौधे का निर्माण उसके कायिक भाग जैसे जड़ , तना पत्तियाँ आदि से होता है , इसे कायिक प्रवर्धन कहते हैं । 

🔷 ( a ) प्राकृतिक विधियाँ :-

🔹 जड़ द्वारा - डहेलिया , शकरकंदी 
🔹 तने द्वारा - आलू , अदरक 
🔹 पत्तियों द्वारा - ब्रायोफिलम की पत्तियों की कोर पर कलिकाएँ होती हैं , जो विकसित होकर नया पौधा बनाती है ।

🔷  ( b ) कृत्रिम विधियाँ  :-

🔹 रोपण - आम 
🔹 कर्तन - गुलाब 
🔹 लेयरिंग - चमेली 

✳️ऊतक संवर्धन - इस विधि में शाखा के सिरे से कोशिकाएँ लेकर उन्हें पोषक माध्यम में रखा जाता है । ये कोशिकाएँ गुणन कर कोशिकाओं के गुच्छे जिसे कैलस कहते हैं में परिवर्तित हो जाती है । कैलस को हॉर्मोन माध्यम में रखा जाता है , जहाँ उसमें विभेदन होकर नए पौधे का निर्माण होता है जिसे फिर मिट्टी में रोपित कर देते है । 

🔹 उदहारण - आर्किक , सजावटी पौधे । 

✳️  कायिक संवर्धन के लाभ

🔹  बीज उत्पन्न न करने वाले पौधे ; जैसे — केला , गुलाब आदि के नए पौधे बना सकते हैं । 
🔹 नए पौधे आनुवंशिक रूप में जनक के समान होते हैं ।
🔹 बीज रहित फल उगाने में मदद मिलती है ।
🔹 पौधे उगाने का सस्ता और आसान तरीका है । 

✳️  लैंगिक प्रजनन :-

🔹 लैंगिक प्रजनन नर व मादा युग्मक के मिलने से होता है ।
🔹  नर व मादा युग्मक के मिलने के प्रक्रम को निषेचन कहते हैं । 
🔹 संतति में विभिन्नता उत्पन्न होती है । 

✳️ पुष्पी पौधों में लैंगिक जनन :-

🔹 फूल पौधे का जनन अंग है । 
🔹 एक फूल के मुख्य भाग — बाह्य दल , पंखुडी , स्त्रीकेसर एवं पुंकेसर होते हैं । 

✳️ फूल के प्रकार :-

✴️ ( i ) उभयलिंगी पुष्प — स्त्रीकेसर व पुंकेसर दोनों उपस्थित होते हैं । उदाहरण — सरसों , गुड़हल । 

✴️ ( ii ) एक लिंगी पुष्प — स्त्रीकेसर और पुंकेसर में से कोई एक ही जननांग उपस्थित होता है ।

🔷 उदाहरण — पपीता , तरबूज । 

✳️ पुष्प की संरचना :-


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✳️ बीज निर्माण की प्रक्रिया :-

🔹 ( i ) परागकोश में उत्पन्न परागकण , हवा , पानी या जन्तु द्वारा उसी फूल के वर्तिक्राग ( स्वपरागण ) या दूसरे फूल के वर्तिकाग्र ( परपरागण ) पर स्थानांतरित हो जाते हैं । 

🔹 ( ii ) परागकण से एक नलिका विकसित होती है जो वर्तिका से होते हुए बीजांड तक पहुँचती है ।

🔹  ( iii ) अंडाशय के अन्दर नर व मादा युग्मक का निषेचन होता है तथा युग्मनज का निर्माण होता है ,

🔹  ( iv ) युग्मनज में विभाजन होकर भ्रूण का निर्माण होता है । बीजांड से एक कठोर आवरण विकसित होकर बीज में बदल जाता है । 

🔹 ( v ) अंडाशय फल में बदल जाता है तथा फूल के अन्य भाग झड़ जाते हैं ।


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✳️ मानव में प्रजनन :-

🔹 मानवों में लैंगिक जनन होता है ।
🔹 लैंगिक परिपक्वता — जीवन का वह काल जब नर में शुक्राणु तथा मादा में अंड - कोशिका का निर्माण शुरू हो जाता है । किशोरावस्था की इस अवधि को यौवनारंभ कहते हैं । 

✳️ यौवनारंभ पर परिवर्तन :-

✴️ ( a ) किशोरों में एक समान

🔹 कांख व जननांग के पास गहरे बालों का उगना । 
🔹 त्वचा का तैलीय होना तथा मुँहासे निकलना ।

✴️ ( b ) लड़कियों में 

🔹 स्तन के आकार में वृद्धि होने लगती है । 
🔹 रजोधर्म होने लगता है । 

✴️ ( c ) लड़कों में 

🔹 चेहरे पर दाढ़ी - मूंछ निकलना । 
🔹 आवाज का फटना ।

👉  ये परिवर्तन संकेत देते हैं कि लैंगिक परिपक्वता हो रही है । . 

✳️ नर जनन तंत्र

✴️ ( i ) वृषण - वृषण उदर गुहा के बाहर वृषण कोष में उपस्थित होते हैं । वृषण कोष तापमान तुलनात्मक रूप से कम होता है , जो शुक्राणु बनने के लिए आवश्यक है । 
🔹 नर युग्मक ( शुक्राणु ) यहाँ पर बनते हैं । 
🔹 वृषण ग्रन्थी , टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन उत्पन्न करती है । 

✴️ टेस्टोस्टेरॉन के कार्य : 

🔹 ( a ) शुक्राणु उत्पादन का नियंत्रण 
🔹 ( b ) लड़कों में यौवनावस्था परिवर्तन 

✴️ ( ii ) शुक्रवाहिनी - ये शुक्राणुओं को वृषण से शिश्न तक पहुँचाती है । 

✴️ ( iii ) मूत्रमार्ग - यह मूत्र और वीर्य दोनों के बाहर जाने का मार्ग हैं । बाहरी आवरण के साथ इसे शिश्न कहते हैं । 

✴️ ( iv ) संबंधित ग्रंथियाँ - शुक्राशय ग्रथि तथा प्रोस्ट्रेट ग्रंथि अपने स्राव शुक्रवाहिनी में डालते हैं । 

👉 इससे -

🔹 शुक्राणु तरल माध्यम में आ जाते हैं । 
🔹 यह माध्यम उन्हें पोषण प्रदान करता है । 
🔹 उनके स्थानांतरण में सहायता करता है । शुक्राणु तथा ग्रंथियों का स्राव मिलकर वीर्य बनाते हैं । 


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✳️ मादा जनन तंत्र 

✴️ ( i ) अंडाशय - 

🔹 मादा युग्मक अथवा अंड - कोशिका का निर्माण अंडाशय में होता है । 
🔹 लड़की के जन्म के समय ही अंडाशय में हजारों अपरिपक्व अंड होते हैं । 
🔹 यौवनारंभ पर इनमें से कुछ अंड परिपक्व होने लगते हैं । 
🔹 दो में से एक अंडाशय द्वारा हर महीने एक परिपक्व अंड उत्पन्न किया जाता है । 
🔹 अंडाशय एस्ट्रोजन व प्रोजैस्ट्रोन हॉर्मोन भी उत्पन्न करता है ।

✴️  ( ii ) अंडवाहिका ( फेलोपियन ट्यूब ) -

🔹 अंडाशय द्वारा उत्पन्न अंड कोशिका को गर्भाशय तक स्थानांतरण करती है । 
🔹 अंड कोशिका व शुक्राणु का निषेचन यहाँ पर होता है । 

✴️ ( iii ) गर्भाशय - 

🔹 यह एक थैलीनुमा संरचना है जहाँ पर शिशु का विकास होता है । 
🔹 गर्भाशय ग्रीवा द्वारा योनि में खुलता हैं । 


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✳️ जब अंड - कोशिका का निषेचन होता है :-

🔹 निषेचित अंड युग्मनज कहलाता है , जो गर्भाशय में रोपित होता है । गर्भाशय में रोपण के पश्चात् युग्मनज में विभाजन व विभेदन होता है तथा भ्रूण का निर्माण होता है । 

🔹 प्लेसेंटा — यह एक विशिष्ट उत्तक हैं जिसकी तश्तरीनुमा संरचना गर्भाशय में धंसी होती है । 
🔹 इसका मुख्य कार्य 

🔹 ( i ) माँ के रक्त से ग्लूकोज ऑक्सीजन आदि ( पोषण ) भ्रूण को प्रदान करना । 
🔹 ( ii ) भ्रूण द्वारा उत्पादित अपशिष्ट पदार्थों का निपटान ।

🔹  अंड के निषेचन से लेकर शिशु के जन्म तक के समय को गर्भकाल कहते हैं । इसकी अवधि लगभग 9 महीने होती है । 

✳️ जब अंड का निषेचन नहीं होता 

🔹 हर महीने गर्भाशय खुद को निषेचित अंड प्राप्त करने के लिए तैयार करता है । 

🔹 गर्भाशय की भित्ती मांसल एवं स्पोंजी हो जाती है । यह भ्रूण के विकास के लिए जरूरी है ।

🔹  यदि निषेचन नहीं होता है तो इस भित्ति की आवश्यकता नहीं रहती । अतः यह पर्त धीरे - धीरे टूट कर योनि मार्ग से रक्त एवं म्यूकस के रूप में बाहर निकलती है ।

🔹  यह चक्र लगभग एक महीने का समय लेता है तथा इसे ऋतुस्राव अथवा रजोधर्म कहते हैं । 

🔹 40 से 50 वर्ष की उम्र के बाद अंडाशय से अंड का उत्पन्न होना बन्द हो जाता है । फलस्वरूप रजोधर्म बन्द हो जाता है जिसे रजोनिवृति कहते हैं । 

✳️ जनन स्वास्थ्य :-

🔹  जनन स्वास्थ्य का अर्थ है , जनन से संबंधित सभी आयाम जैसे शारीरिक , मानसिक , सामाजिक एवं व्यावहारिक रूप से स्वस्थ्य होना ।

🔹 रोगों का लैंगिक संचरण - ( STD's ) अनेक रोगों का लैंगिक संचरण भी हो सकता है ; जैसे— 

( a ) जीवाणु जनित — गोनेरिया , सिफलिस 
( b ) विषाणु जनित — मस्सा ( warts ) , HIV - AIDS 

     कंडोम के उपयोग से इन रोगों का संचरण कुछ सीमा तक रोकना संभव है । 

🔹 गर्भरोधन - गर्भधारण को रोकना गर्भरोधन कहलाता है । .

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✳️ गर्भरोधन के प्रकार

✴️ ( a ) यांत्रिक अवरोध :- 

🔹 शुक्राणु को अंडकोशिका तक नहीं पहुँचने दिया जाता । 
👉  उदाहरण :-
🔹 शिश्न को ढकने वाले कंडोम 
🔹 योनि में रखे जाने वाले सरवाइकल कैप 

✴️ ( b ) रासायनिक तकनीक 

🔹 मादा में अंड को न बनने देना , इसके लिए दवाई ली जाती है जो हॉर्मोन के संतुलन को परिवर्तित कर देती है । 

🔹 इनके अन्य प्रभाव ( विपरीत प्रभाव ) भी हो सकते हैं ।

✴️  ( c ) IUCD ( Intra Uterine contraceptive device ) :-

🔹 लूप या कॉपर- T को गर्भाशय में स्थापित किया जाता है । जिससे गर्भधारण नहीं होता । 

✴️ ( d ) शल्यक्रिया तकनीक :-

🔷 ( i ) नसबंधी – पुरुषों में शुक्रवाहिकाओं को रोक कर , उसमें से शुक्राणुओं के स्थानांतरण को रोकना । 

🔷 ( ii ) ट्यूबेक्टोमी — महिलाओं में अंडवाहनी को अवरुद्ध कर , अंड के स्थानांतरण को . रोकना । 

✳️ भ्रूण हत्या - मादा भ्रूण को गर्भाशय में ही मार देना भ्रूण हत्या कहलाता है । 




एक स्वस्थ्य समाज के लिए , संतुलित लिंग अनुपात आवश्यक है । यह तभी संभव होगा जब लोगों में जागरूकता फैलाई जाएगी व भ्रूण हत्या तथा भ्रूण लिंग निर्धारण जैसी घटनाओं को रोकना होगा ।

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