12 Class Geography - II Notes in hindi chapter 9 Planning and Sustainable Development in Indian Context अध्याय - 9 भारत के संदर्भ में नियोजन एवं सतत् पोषणीय विकास

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12 Class Geography - II Notes in hindi chapter 9  Planning and Sustainable Development in Indian Context अध्याय - 9 भारत के संदर्भ में नियोजन एवं सतत् पोषणीय विकास

CBSE Revision Notes in hindi for CBSE Class 12 Geography Chapter 19 India Planning and Sustainable Development In Indian Context Class 12 Geography Chapter 19 India Planning and Sustainable Development In Indian Context - target group area planning (case study), idea of sustainable development (case study).

Class 12th Geography - II BOOK chapter 9 Planning and Sustainable Development In Indian Context Notes In Hindi 

12 Class Geography - II Notes in hindi chapter 9  Planning and Sustainable Development in Indian Context अध्याय - 9 भारत के संदर्भ में नियोजन एवं सतत् पोषणीय विकास


📚 अध्याय - 9 📚
👉 भारत के संदर्भ में नियोजन एवं सतत् पोषणीय विकास 👈


✳️ नियोजन :-

🔹 नियोजन का तात्पर्य सोच विचार की प्रक्रिया , कार्यक्रम की रूप रेखा तैयार करना तथा उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए गतिविधियों के क्रियान्वयन से है ।

✳️ खण्डीय नियोजन :- 

🔹 अर्थव्यस्था के विभिन्न सेक्टरों जैसे - कृषि , सिंचाई , विनिर्माण , ऊर्जा , परिवहन , संचार , सामाजिक अवसंरचना और सेवाओं के विकास के लिए कार्यक्रम बनाना और उन्हें लागू करना ।

✳️  प्रादेशिक नियोजन :-

🔹 देश के सभी क्षेत्रों में आर्थिक विकास समान रूप से नहीं हो पाता । इसलिए विकास का लाभ सभी को समान रूप से पहुँचाने के लिए योजनाकारों ने प्रदेशों की आवश्यकता के अनुसार नियोजन किया । इस प्रादेशिक नियोजन कहते हैं ।

✳️ सतत् पोषणीय विकास :-

🔹  एक ऐसा विकास जो भविष्य में आने वाली पीढ़ियों की आवश्यकता पूर्ति को प्रभावित किए बिना वर्तमान पीढ़ी द्वारा आवश्यकता की पूर्ति हेतु किया जाता है , सतत् पोषणीय विकास कहलाता है । उदाहरण स्वरूप - भौम जल का उपयोग करते समय इस बात का ध्यान रखना कि जलस्तर अधिक नीचे न जाने पाये और वर्षा जल या धरातलीय जल रिस कर अन्दर चला जाये ।


✳️ पर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम :-

🔹 नेशनल कमेटी आन दि डेवलपमेंट ने 1981 में 600 मी . से अधिक की ऊँचाई वाले पहाड़ी क्षेत्रों को इस योजना के अन्तर्गत शामिल करने की सिफारिश की जो जनजातियों के लिए बने योजनाओं के अन्तर्गत न आते हो । इन क्षेत्रों की भूआकृति , पारिस्थितिकी , सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थिति को ध्यान में रखकर विकास योजनायें बनायी जाती है ।

✳️ पर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम को बनाते समय किन बातों को ध्यान में रखा :-

🔹 ( 1 ) सभी लोगों को लाभ मिले ।

🔹 ( 2 ) स्थानीय संसाधनों एवं प्रतिभाओं का विकास हो ।

🔹 ( 3 ) पिछड़े क्षेत्रों को व्यापार में शोषण से बचाना आदि ।

✳️ सूखा संभावी क्षेत्र विकास कार्यक्रम :- 

🔹 इस कार्यक्रम की शुरूवात चौथी पंचवर्षीय योजना में हुई , इसका उददेश्य सूखा संभावी क्षेत्रों में लोगों को रोजगार उपलब्ध करवाना था व उसके प्रभाव को कम करने के लिए उत्पादन के साधनों को विकसित करना था । 

🔹 पांचवी पचवर्षीय योजना में इस कार्यक्रम के अंतर्गत अधिक श्रम की आवश्यकता वाले सिविल निर्माण कार्यों पर बल दिया ताकि अधिक से अधिक लोगों को रोज़गार दिया जा सके । 

🔹 इसके अंतर्गत सिंचाई परियोजनाओं , भूमि विकास कार्यक्रमों वनीकरण , चारागाह विकास कार्यक्रम शुरू किये गये । 

🔹  गांवों में आधार भूत अवसंरचना - विद्युत , सड़कों , बाजार - ऋण सुविधाओं और सेवाओं पर बल दिया गया । 

🔹 इस क्षेत्र के विकास की रणनीति में जल , मिट्टी , पौधों , मानव तथा पशु जनसंख्या के बीच परिस्थितिकीय संतुलन , पुनः स्थापन पर ध्यान देने पर बल दिया गया ।

✳️ भरमौर क्षेत्र विकास कार्यक्रम :-

🔹 यह क्षेत्र विकास योजना भरमौर क्षेत्र के निवासियों की जीवन गुणवत्ता को सुधारने व हिमाचल के अन्य प्रदेशों के समानान्तर विकास के उद्देश्य से शुरू की गई थी । इसके लिए निम्न कदम उठाये गये । 

🔹  आधारभूत अवसंरचनाओं जैसे विद्यालयों , अस्पतालों का विकास किया गया । 

🔹 स्वच्छ जल , सड़कों , संचार तंत्र एवं बिजली की उपलब्धता पर ध्यान दिया गया । 

🔹  कृषि के नये एवं पर्यावरण अनुकूल तरीकों को प्रोत्साहित किया गया । 

🔹 पशुपालन के वैज्ञानिक तरीकों को प्रोत्साहित किया गया ।

✳️ समाजिक व आर्थिक प्रभाव :-

🔹  जनसंख्या में साक्षरता दर बढ़ी विशेषरूप से स्त्रियों की साक्षरता दर में वृद्धि हुई । 

🔹 दालों एवं अन्य नगदी फसलों के उत्पादन में वृद्धि हुई । 

🔹  कुरीतियों जैसे बाल - विवाह से समाज को मुक्ति मिली । 

🔹  लिंगानुपात में सुधार हुआ । 

🔹  लोगों के जीवन स्तर में वृद्धि हुई ।

✳️ इंदिरा गांधी नहर सिंचाई के पर्यावरण पर प्रभाव :- 

🔹 सकारात्मक प्रभाव :-

अब , लंबी अवधि के लिए मिट्टी की पर्याप्त उपलब्धता है । विभिन्न वनीकरण और चारागाह विकास कार्यक्रम अस्तित्व में आए । हवा के कटाव और नहर प्रणालियों की गाद में काफी कमी दर्ज की गई है । 

🔹  नकारात्मक प्रभाव :-

गहन सिंचाई और पानी के अत्यधिक उपयोग के कारण जल भराव और मिट्टी की लवणता की एक खतरनाक दर दर्ज की गई है ।

✳️ इंदिरा गांधी नहर सिंचाई के कृषि पर प्रभाव :- 

🔹  सकारात्मक प्रभाव 

🔹 इस नहर की सिंचाई से खेती योग्य भूमि में वृद्धि हुई और फसल की तीव्रता बढ़ी । मुख्य वाणिज्यिक फसलों यानी गेहूं , चावल , कपास , मूंगफली ने सूखा प्रतिरोधी फसलों जैसे चना , बाजरा , और ज्वार की जगह ले ली । 

🔹 नकारात्मक प्रभाव :-

 गहन सिंचाई भी जल जमाव और मिट्टी की लवणता का कारण बन गई है । इसलिए , निकट भविष्य में यह कृषि की स्थिरता को बाधित कर सकता है ।

✳️ . इंदिरा गांधी नहर कमान क्षेत्र में सतत् पोषणीय विकास को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक उपाय :-

🔹  जल प्रबन्धन नीति का कठोरता से क्रियान्वयन करना ।

🔹  सामान्यतः जल सघन फसलों को नहीं बोना चाहिए । 

🔹 कमान क्षेत्र विकास कार्यक्रम जैसे नालों को पक्का करना , भूमि विकास तथा समतलन और बाड़बन्दी पद्धति प्रभावी रूप से कार्यान्वित की जाए ताकि बहते जल की क्षति मार्ग में कम हो सके । 

🔹 जलाक्रान्त , वृक्षों की रक्षण मेखला का निर्माण और चारागाह विकास , पारितंत्र विकास से लिए अति आवश्यक है । 

🔹  निर्धन आर्थिक स्थिति वाले भूआवदियों की कृषि के पर्याप्त मात्रा में वितीय और संस्थागत सहायता उपलब्धत कराना ।

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