12 Class Geography - II Notes in hindi chapter 8 Manufacturing Industries अध्याय - 8 निर्माण उद्योग

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12 Class Geography - II Notes in hindi chapter 8 Manufacturing Industries अध्याय - 8 निर्माण उद्योग

CBSE Revision Notes for CBSE Class 12 Geography Chapter 18 India Manufacturing Industries Class 12 Geography Chapter 18 India Manufacturing Industries - types, factors of industrial location, distribution and changing pattern of selected industries-iron and steel, cotton textiles, sugar, petrochemicals, and knowledge based industries, impact of liberalization, privatisation and globalisation on industrial location, industrial clusters. 

Class 12th Geography - II BOOK chapter 8 Manufacturing Industries Notes In Hindi 



📚  अध्याय - 8 📚
👉 निर्माण उद्योग 👈


✳️  औद्योगिक प्रदेश :-

🔹  किसी निर्धारित क्षेत्र में उद्योगों का संकेन्द्रण होना , श्रमिकों का अधिक होना , औद्योगिक कार्यों में ऊर्जा की खपत अधिक होना और उत्पाद का मूल्य अधिक होना , किसी प्रदेश को औद्योगिक प्रदेश का दर्जा देते हैं ।

✳️ ज्ञान आधारित उद्योग :-

🔹 अति उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति , वैज्ञानिक , इंजीनियर आदि उत्पादन कार्य में विशिष्ट ज्ञान का उपयोग करते हैं । तो इसे ज्ञान आधारित उद्योग कहते है।

✳️ पैट्रोकेमिकल उद्योग :-

🔹  भूगर्भ से निकले खनिज तेल के परिशोधन के फलस्वरूप कई प्रकार के उत्पादन प्राप्त होते हैं । उसी को कच्चे माल के रूप में प्रयोग करके कई प्रकार की वस्तुएँ बनती हैं । इसे ही पेट्रोकेमिकल उद्योग कहते हैं । प्लास्टिक उद्योग , सिन्थेटिक वस्त्र उद्योग , उर्वरक आदि पेट्रोकेमिकल उद्योग के उदाहरण है ।

✳️ विनिर्माण उद्योग :-

🔹  कच्चे माल को मशीनों की सहायता से , रूप बदल कर अधिक उपयोगी तैयार माल प्राप्त करने की क्रिया को निर्माण उद्योग कहते हैं । इसमें वस्तु का रूप तो बदल ही जाता है , साथ ही वह अधिक उपयोगी भी हो जाती है और निर्माण द्वारा उस पदार्थ की मूल्य वृद्धि भी हो जाती है । कपास से धागा व कपड़ा बनने से कपास के मूल्य में वृद्धि हो जाती है ।

✳️ भारी उद्योग :-

🔹  खनिज पदार्थों का उपयोग करने वाले आधारभूत उद्योगों को भारी उद्योग कहते हैं । इन उद्योगों में लगने वाला कच्चा माल भी भारी होता है तथा उत्पाद भी । ये उद्योग किसी भी देश के औद्योगिकरण की आधारशिला है । जैसे - लोहा - इस्पात उद्योग , मशीनरी उद्योग , इंजीनियरिंग समान बनाने के उद्योग भारी उद्योगों में गिने जाते हैं ।

✳️ भारत में किसी प्रदेश के उद्योगों की स्थिति को प्रभावित करने वाले कारक :-

🔹  1 ) कच्चे माल की उपलब्धता :- सामान्यता उद्योग वहीं स्थापित होते है जहाँ कच्चा माल उपलब्ध होता है । जिन उद्योगों में निर्मित वस्तुओं का भार कच्चे माल के समीप लगाए जाते हैं ।

🔹 2 ) शक्ति के साधन :- किसी भी उद्योग की स्थापना से पहले उसकी शक्ति की आपूर्ति सुनिश्चित कर ली जाती है । एल्युमिनियम उद्योग शक्ति के साधन के नजदीक लगाए जाते हैं क्योंकि इसमें बिजली का बहुत अधिक उपयोग किया जाता है ।

🔹 3 ) परिवहन :- कच्चे माल को उद्योग केन्द्र तक लाने तथा निर्मित माल को बाजार तक ले जाने के लिए सस्ते तथा कुशल यातायात का प्रचुर मात्रा में होना आवश्यक हैं ।

🔹 4 ) बाजार :- उद्योगों का सारा विकास निर्मित माल की खपत के बाजर पर निर्भर करता है । बाजार की निकटता से उपभोक्ता को औद्योगिक उत्पाद सस्ते दाम पर मिल जाते हैं ।

🔹 5 ) श्रम :- सस्ते तथा कुशल श्रम की प्रचुर मात्रा में उपलब्धता औद्योगिक विकास का मुख्य कारण है । कुछ उद्योग तो श्रम प्रधान ही होते हैं । इन्हें विशेष दक्षता वाले श्रमिकों की आवश्यकता होती हैं जैसे फिरोजाबाद का चूड़ी उद्योग श्रम प्रधान उद्योग है ।

🔹 6 ) ऐतिहासिक कारक :- मुंबई , कोलकाता और चेन्नई जैसे केन्द्रों का औपनिवेशिक काल में ही विकास हो गया था मुर्शिदाबाद , भदोही , सूरत , बड़ौदा , प्राचीन समय से ही औद्योगिक केन्द्र के रूप में उभर आये थे ।

✳️ नई औद्योगिक नीति :-

🔹  नई औद्योगिक नीति की घोषणा 1991 में की गई ।

✳️ नई औधोगिक नीति के प्रमुख उद्देश्य :-

🔹 1 ) अब तक प्राप्त किए गए लाभ को बढ़ाना ।

🔹 2 ) पुरानी औद्योगिक नीति की कमियों को दूर करना ।

🔹 3 ) उत्पादकता और लाभकारी रोजगार में स्वपोषित वृद्धि को बनाए रखना है ।

🔹 4 ) अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता प्राप्त करना है ।

✳️ भारत की नई औद्योगिक नीति ( 1991 ) में किए गए छ : उपायों :-

🔹  1 ) औद्योगिक लाइसेंस व्यवस्था का समापन

🔹  2 ) विदेशी तकनीकी का निःशुल्क प्रवेश

🔹 3 ) विदेशी निवेश नीति

🔹  4 ) पूंजी बाजार की सुलभता

🔹 5 ) खुला बाजार

🔹  6 ) औद्योगिक अवस्थिति कार्यक्रम का उदारीकरण - इस नीति में उदारीकरण , निजीकरण और वैश्वीकरण शामिल है ।

✳️ सूती वस्त्र उद्योग का वितरण :-

🔹 वितरण - सर्वप्रथम मुंबई एवं अहमदाबाद में सूती वस्त्र उद्योग का विकास हुआ । तत्पश्चात द . भारत में कोयम्बटूर , मदुरै और बैंगलोर में यह उद्योग फैला । इसके अतिरिक्त नागपुर , इंदौर , शोलापुर , कानपुर , वड़ोदरा आदि केन्द्र बने । आज तमिलनाडु में सबसे अधिक मिले हैं । कारण - समस्त देश में

✳️ सूती वस्त्र उद्योग के विस्तार के प्रमुख कारण :-

🔹 1 ) सस्ते स्थानिक श्रम ।

🔹 2 ) विद्युत शक्ति की उपलब्धता ।

🔹 3 ) कच्चा माल एवं उत्पादित माल हल्का होने के कारण यह बाज़ार केन्द्रित उद्योग है अर्थात् कच्चे माल ( कपास ) के स्रोत के पास नहीं वरन् बाज़ार के पास उद्योगों का होना ।

🔹 4 ) परिवहन सुविधा का विकास ।

✳️ सूती वस्त्र उद्योग के सेक्टरों के नाम :-

🔹  दो सेक्टर हैं - हथकरघा सेक्टर और विद्युत - करघा सेक्टर । उत्पादन भी सीमित है । .

✳️ हथकरघा सैक्टर :-

🔹  सैक्टर स्थानिक श्रम तथा कच्चे माल पर निर्भर करता है तथा इसका उत्पादन भी सीमित है ।

✳️ विद्युत करघा सेक्टर :-

🔹 विद्युत करघा सेक्टर में कपड़ा मशीनों द्वारा उत्पादित किया जाता है यह सेक्टर देश के कुल उत्पादन का 50 प्रतिशत भाग उत्पादित करता है ।

✳️ भारत में सूती वस्त्र उद्योग की समस्याएं :- 

🔹 1 ) देश में लम्बे रेशेवाली कपास का उत्पादन कम है अतः इसे विदेशों से आयात करना पड़ता है ।

🔹 2 ) सूती कपड़ा मिलों की मशीनरी पुरानी है अतः इसे विदेशों से आयात करना पड़ता है ।

🔹 3 ) मशीनरी के आधुनिकीकरण के लिए स्वचालित मशीनें लगाना आवश्यक है जिसके लिए पर्याप्त पूंजी की आवश्यकता है ।

🔹 4 ) देश में हथकरघा उद्योग में प्रतिस्पर्धा है ।

🔹 5 ) विदेशों में भी चीन व जापान के तैयार वस्त्रों से अधिक स्पर्धा करनी पड़ रही है ।

✳️ चीनी उद्योग एक मौसमी उद्योग क्यों है ?

🔹  1 ) गन्ना अगर खेत से काटने के 24 घंटे के अंदर ही पेरा जाए ( रस निकालना ) तो अधिक चीनी की मात्रा प्राप्त होती है ।

🔹 2 ) शुष्क ऋतु में गन्ने को खेत में नहीं रखा जा सकता । सूखने पर चीनी की मात्रा कम हो जाती है । इसलिए इसे काट कर फौरन मिलों तक भेजा जाना ज़रूरी है । मिले केवल उस मौसम में कार्य करती है जब उसे काटा जाता है ।

🔹  3 ) गन्ने की पिराई का काम वर्ष भर नहीं होता केवल 4 से 6 महीने तक ही मिल चल पाती हैं ।

✳️ उदारीकरण : -

🔹 उदारीकरण से अभिप्राय है निजी क्षेत्र से सभी प्रकार के प्रतिबंधों को हटाना ताकि वह क्षेत्र अधिक प्रतिस्पर्धा के योग्य बन सके ।

✳️  निजीकरण :-

🔹 निजी क्षेत्र में अधिक से अधिक उद्योगों को सम्मिलित करना । सरकार का प्रभुत्व समाप्त करना तथा नए क्षेत्र जैसे खनन , दूरसंचार , मार्ग निर्माण और व्यवस्था को व्यक्तिगत कंपनियों के लिए खोलना ।

✳️  वैश्वीकरण :-

🔹  इसके द्वारा देश की अर्थव्यवस्था को संसार की अर्थव्यवस्था के साथ एकीकृत करना है । इस प्रक्रिया के अंतर्गत सामान पूँजी सहित सेवाएँ , श्रम और संसाधन एक देश से दूसरे देश को स्वतंत्रतापूर्वक पहुँचाए जा सकते हैं ।

✳️ उदारीकरण की मुख्य विशेषताएँ :- 

🔹 1 ) औद्योगिक लाइसेंस व्यवस्था को समाप्त करना ।

🔹 2 ) विदेशी टेक्नोलॉजी का भारत में प्रयोग में स्वतंत्रता ।

🔹 3 ) विदेशी निवेश का उदारीकरण ।

🔹 4 ) खुला व्यापार ।

✳️ उदारीकरण , निजीकरण और वैश्वीकरण ने भारत के औद्योगिक विकास में किस प्रकार से सहायता की है :-

🔹 विदेशी सहयोग में वृद्धि हुई है । विदेशी निवेश का बड़ा भाग घरेलू उपकरणों , वित्त सेवा , इलेक्ट्रानिक और विद्युत उपकरण तथा खाद्य व दुग्ध उत्पादकों में लगाया जा चुका है ।

🔹 प्रतिस्पर्धा के परिणामस्वरूप कुछ भारतीय कंपनियों को भी लाभ हुआ है , उनको नई तकनीक में निवेश का अवसर प्राप्त हुआ । इसके फलस्वरूप यह कंपनियाँ अपने उत्पादन में वृद्धि करने में सफल रही ।

🔹 टाटा मोटर , इन्फासिस जैसी कम्पनियों ने विश्वभर में अपनी शाखायें खोली है ।

🔹 छोटे उत्पादकों पर वैश्वीकरण का बुरा प्रभाव पड़ा । वे बड़ी कम्पनियों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकी ।

✳️ रासायनिक व पैट्रोरासायनिक विभाग के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य कर रही  संस्थायें :- 

👉 1 ) भारतीय पैट्रोरासायनिक कार्पोरेशन लिमिटेड ( IPCL ) सार्वजनिक सैक्टर में है । यह विभिन्न प्रकार के पैट्रोरसायन जैसे - पॉलीमर , रेशों और देशों से बने संक्रियक ( Intermediate ) का निर्माण और वितरण करता है ।

👉  2 ) पैट्रो फितस कोऑपरेटिव लिमिटेड - यह भारत सरकार एवं संस्थानों का संयुक्त प्रयास है । यह पॉलिस्टर तन्तु , सूत और नाइलोन चिप्स का उत्पादन गुजरात स्थित बड़ोदरा एवं नलधारी संयन्त्रों में करता है ।

👉 3 ) सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ प्लास्टिक इंजीनियरिंग एंड टेक्नालाजी ( CIPET ) है जो पैट्रोकेमिकल उद्योग में प्रशिक्षण प्रदान करता है ।

✳️ मुम्बई - पुणे औद्योगिक प्रदेश की प्रमुख विशेषताएं :- 

🔹 1 ) यह प्रदेश मुम्बई : - थाणे से पुणा तथा नासिक और शोलापुर जिलों के समीपवर्ती क्षेत्रों तक विस्तृत है ।

🔹 2 ) इस प्रदेश का विकास मुंबई में सूती वस्त्र उद्योग की स्थापना के साथ प्रारम्भ हुआ ।

🔹 3 ) मुम्बई हाई पैट्रोलियम क्षेत्र और नाभिकीय ऊर्जा संयत्र की स्थापना से इस प्रदेश का औद्योगिक तीव्र गति से हुआ ।

🔹 4 ) यहाँ अभियान्त्रिकी वस्तुएँ , पैट्रोलियम , परिशोधन पैट्रो - रसायन , चमड़ा , प्लास्टिक वस्तुएँ , दवाएँ , उर्वरक , विद्युत वस्तुएँ , जलयान , निर्माण , सॉफ्टवेयर इत्यादि उद्योगों का विकास हुआ है ।

🔹5 ) इस प्रदेश में मुम्बई , थाणे . ट्राम्बे , पूना , नासिक , मनमाड़ , शोलापुर , कोल्हापुर , सतारा तथा सांगली महत्वपूर्ण औद्योगिक केन्द्र है ।

✳️ गुजरात औद्योगिक प्रदेश की प्रमुख विशेषताएं :-

🔹 1 ) यह प्रदेश अहमदाबाद एवं बड़ोदरा के बीच स्थित है । यह प्रदेश दक्षिण में बलसाद और सूरत तक या पश्चिम में जामनगर तक फैला ।

🔹 2 ) यह प्रदेश की सूती वस्त्र उद्योग का महत्वपूर्ण केन्द्र है । सूती वस्त्र उद्योग के अतिरिक्त पैट्रों , रसायनिक उद्योग , इंजीनियरिंग उद्योग , चीनी उद्योग एवं दवाई उद्योग यहाँ के प्रमुख उद्योग है ।

🔹 3 ) इस प्रदेश को कपास उत्पादक क्षेत्र में स्थित होने के कारण कच्चे माल और बाजार दोनों का ही लाभ प्राप्त है ।

🔹 4 ) इस प्रदेश के महत्वपूर्ण औद्योगिक केन्द्र अहमदाबाद , बडोदरा , भरूच कोयली , सूरत बलसाद तथा जामनगर आदि हैं ।

🔹 5 ) काँधला बन्दरगाह ने इस औद्योगिक प्रदेश के विकास में तेजी लाने में योगदान किया ।

🔹 6 ) कोयली तेल शोधनशाला के कारण पेट्रो - केमिकल उद्योग स्थापित हुये ।

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