Class 11 Economics CBSE Notes chapter 7 Forms of Market and Price Determination under perfect competition with simple applications ( 7 . बाजार के प्रमुख रूप तथा पूर्ण प्रतियोगिता में कीमत निर्धारण ) in hindi Medium 2019 , 2020 latest

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11th class economic notes in hindi 


11th class economic notes in hindi


11th class economic notes in hindi

बाजार से अभिप्राय एक ऐसी व्यवस्था से है जिसमें एक वस्तु या सेवा के क्रेता तथा विक्रेता क्रय - विक्रय हेतु एक - दूसरे के सम्पर्क में रहते हैं । 

बाजार निम्न आधार पर वर्गीकृत किए जाते हैं : 

( i ) क्रेताओं एवं विक्रेताओं की संख्या 
( ii ) वस्तु की प्रक्रति 
( iii ) फर्मों के प्रवेश तथा बहिर्गमन की स्वतंत्रता 
( iv ) कीमत निर्धारण 


बाजार के प्रमुख रूपः 

1 . पूर्ण प्रतियोगिता 
2 . एकाधिकार 
3 . एकाधिकारी प्रतियोगिता 
4 . अल्पाधिकार 

पूर्ण प्रतियोगिता : 

पूर्ण प्रतियोगिता बाजार का वह रूप है जिसमें बहुत बड़ी संख्या में क्रेता और विक्रेता उद्योग द्वारा निर्धारित कीमत पर समरूप वस्तु का क्रय - विक्रय करते हैं । 

🔹पूर्ण प्रतियोगिता में प्रति इकाई कीमत स्थिर रहने के कारण औसत व सीमांत संप्राप्ति समान रहते हैं । अत : इनके वक्र Ox - अक्ष के समांतर होते हैं ।


11th class economics notes in hindi

🔹 पूर्ण प्रतियोगिता में कीमत निर्धारण उद्योग द्वारा किया जाता है जो कि माँग एवं पूर्ति की शक्तियों से प्रभावित होता है । समरूप वस्तु होने के कारण कोई भी व्यक्तिगत फर्म या उपभोक्ता किसी वस्तु की कीमत को प्रभावित नहीं कर पाता । अत : उद्योग कीमत निर्धारक तथा फर्म कीमत स्वीकारक होती है । 

पूर्ण प्रतियोगिता की विशेषताएँ एवं निहितार्थ विक्रेताओं



एकाधिकार बाजार :- 

एक ऐसी बाजार व्यवस्था जहाँ एक अकेली फर्म ऐसी वस्तु का उत्पादन करता हो जिसका कोई निकट स्थानापन्न उपलब्ध न हो । इसमें अन्य फर्मों के प्रवेश पर प्रतिबंध होते हैं । एकाधिकार में फर्म अपने आप में उद्योग होती है तथा अपने अधिकतम फायदे के लिए कीमत निर्धारित करती है ।

विशेषताएं :-

( a ) एक विक्रेता
( b ) नए फर्मों के प्रवेश तथा बहिर्गमन पर पूर्ण प्रतिबंध
( c ) निकट स्थानापन्न वस्तु का अभाव
( D ) फर्म कीमत निर्धारक होती हैं ।
( E ) कीमत विभेद - समान वस्तु अथवा सेवा के लिए फर्म अलग - अलग ग्राहकों से अलग - अलग कीमत वसूलती है ।

🔹 मांग वक्र ऋणात्मक ढाल वाला होता है तथा मांग वक बेलोचदार ( कम लोचदार ) होता है ।

एकाधिकारिक प्रतियोगिता 

एक ऐसी बाजार व्यवस्था जिसमें क्रेताओं एवं विक्रेताओं की संख्या अधिक होती है तथा विक्रेता विभेदीकृत वस्तुओं को बेचते हैं जो रंग , आकार व रूप में एक - दूसरे से भिन्न होती हैं जिसके कारण उपभोक्ता को उत्पाद के विषय में पूर्ण ज्ञान नहीं होता है ।

विशेषताएं :-

( a ) क्रेता व विक्रेता की संख्या अधिक
( b ) वस्तु विभेद : वस्तुएँ विभेदीकृत होती हैं तथा एक - दूसरे के पूर्ण स्थानापन्न न होकर निकट स्थानापन्न होती हैं ।
( c ) विक्रय लागत - वस्तुओं के विज्ञापन एवं विक्रय प्रोत्साहन पर होने वाले व्यय अधिक
( d ) नई फर्मों के प्रवेश एवं निकास पर कोई प्रतिबंध नहीं ।
( e ) उपभोक्ता को पूर्ण ज्ञान का अभाव
( f ) मांग वक्र अधिक लोचदार होता है ।

अल्पाधिकार:- 

अल्पाधिकार बाजार का ऐसा स्वरूप है जिसमें वस्तु के उत्पादन हेतु बड़ी फर्मों की कम संख्या होती हैं । तथा कीमत तथा उत्पादन संबंधी निर्णयों में फर्मों में अन्तनिर्भरता पायी जाती है ।

विशेषताएँ :-

( a ) सभी फर्मे समरूप या विभेदात्मक वस्तुओं का उत्पादन करती हैं ।
( b ) बड़ी फर्मों की कम संख्या
( c ) अल्पाधिकार बाजार में नई फर्म का प्रवेश असंभव नहीं लेकिन कठिन होता है ।
( d ) अल्पाधिकार बाजार में मांग वक्र अनिश्चित होता है ।
( e ) अल्पाधिकार बाजार में कीमत तथा उत्पादन मात्रा के निर्धारण हेत फर्मों में अंतर्निर्भरता होती है । किसी भी फर्म द्वारा उत्पादन या कीमत के विषय में परिवर्तन हेतु उठाया गया कदम अन्य फर्मों की प्रतिक्रिया का कारण बनता है ।

🔹अल्पाधिकार को निम्न भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है

सहयोगी तथा असहयोगी अल्पाधिकार :- 

( 1 ) सहयोगी अल्पाधिकार : अल्पाधिकार का वह रूप जिसमें सभी फर्म आपसी सहयोग के आधार पर उत्पादन की मात्रा तथा कीमत निर्धारित करती है ।
( 2 ) असहयोगी अल्पाधिकार : अल्पाधिकार का वह रूप जिसमें कीमत तथा उत्पाद की मात्रा निर्धारित करते समय फर्मों के बीच सहयोगी व्यवहार की अपेक्षा प्रतियोगी व्यवहार होता है तथा प्रत्येक फर्म अपनी प्रतियोगी फर्मों की प्रतिक्रिया को ध्यान में रखकर अपने निर्णय लेती है ।

पूर्ण तथा अपूर्ण अल्पाधिकार :- 

( 1 ) पूर्ण अल्पाधिकार : पूर्ण अल्पाधिकार में सभी फर्मे सजातीय ( समरूप ) वस्तुओं का उत्पादन करती है
( 2 ) अपूर्ण अल्पाधिकार : अपूर्ण अल्पाधिकार में फर्मे विभेदात्मक वस्तुओं का उत्पादन करती है ।

बाजार के विभिन्न रूपों में तुलनात्मक अध्ययन


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🔹 संतुलन कीमत : वस्तु की वह कीमत है जिस पर बाजार मांग तथा बाजार पूर्ति बराबर होते हैं ।

🔹 बाजार संतुलन : बाजार की वह अवस्था है जिसमें बाजार मांग तथा बाजार पूर्ति बराबर होते हैं । बाजार में अतिरिक्त मांग या अतिरिक्त पूर्ति की स्थिति का अभाव होता है ।

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पूर्ण प्रतियोगिता बाजार में कीमत निर्धारण 

बाजार मांग तथा बाजार पूर्ति जहां एक दूसरे को काटते हैं अर्थात जहां बराबर होते हैं वह संतुलन बिन्दु कहलाता है । इस संतुलन बिन्दु पर स्थित कीमत संतुलन कीमत तथा इस बिन्दु की मात्रा संतुलन मात्रा कहलाती है । अत : बाजार की संतुलन कीमत तथा संतुलन मात्रा बाजार मांग तथा पूर्ति द्वारा निर्धारित की जाती है । बाजार मांग या बाजार पूर्ति में कोई भी परिवर्तन संतुलन बिन्दु , संतुलन कीमत तथा संतुलन मात्रा में परिवर्तन कर देता है ।

🔹पूर्ति में वृद्धि के कारण संतुलन कीमत तथा संतुलन मात्रा में प्रभावों की श्रृंखला-

( 1 ) पूर्ति में वृद्धि होने पर पूर्ति वक्र दाई ओर खिसकता है तथा नया पूर्ति वक्र s1 S बनता है ।
( 2 ) दी गई बाजार कीमत पर पूर्ति आधिक्य की स्थिति बन जाती है जो EF है ।
( 3 ) उत्पादकों में अपना उत्पाद बेचने हेतु प्रतियोगिता होती है ।
( 4 ) उत्पादक अपने उत्पाद की कीमतों में कमी करते हैं क्योंकि उनके वांछनीय स्टॉक बढ़ जाते हैं ।
( 5 ) कीमतों में कमी के कारण मांग में विस्तार तथा पूर्ति में संकुचन होता है । यह प्रक्रिया संतुलन बिन्दु प्राप्त होने तक चलती रहती है । जो →→ के निशान द्वारा दर्शाई गई । अब मांग = पूर्ति

परिणाम - संतुलन कीमत कम हो जाती है और संतुलन मात्रा में वृद्धि हो जाती है । अत : नई संतुलन कीमत P कम होकर P , नई संतुलन मात्रा 0 से बढ़कर , , तथा संतुलन बिंदु E से E , हो जाता है ।

उच्चतम कीमत तथा न्यूनतम कीमत का निर्धारण 

उच्चतम कीमत 

🔹जब सरकार ऐसा देखती है कि आवश्यक वस्तुओं की स्थिति में संतुलन कीमत इतनी अधिक हो गई है कि एक आम उपभोक्ता उस कीमत पर वस्तु नहीं खरीद पाता । ऐसी स्थिति में सरकार एक अधिकतम कीमत निर्धारण करती है जो संतुलन कीमत से कम होती है । सरकार द्वारा निर्धारित उच्चतम कीमत से अधिक कीमत पर उस वस्तु को नहीं बेचा जा सकता । सरकार यह कदम अक्सर उपभोक्ताओं के संरक्षण हेतु उठाती है ।

दूसरी ओर न्यूनतम कीमत 

समर्थित मूल्य निर्धारित करके उत्पादकों के हितों की रक्षा करती है । जब वस्तुओं का उत्पादन इतना अधिक हो जाता है कि । संतुलन कीमत अत्यधिक निम्न हो जाती है , तो ऐसी स्थिति में उत्पादकों , किसानों को हानि होती है । तब सरकार न्यूनतम समर्थित मूल्य का निर्धारण करती है , जो संतुलन कीमत से अधिक होती है ।

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