Chapter=3 बंधुत्व , जाति तथा वर्ग : आरंभिक समाज लगभग 600 ई . पू . 600 ई .(( KINSHIP CASTE AND CLASS IN EARLY SOCIETIES )) ( हड़प्पा सभ्यता ) 12th class History Hindi Notes

💮🌸Chapter=3 बंधुत्व , जाति तथा वर्ग : आरंभिक समाज लगभग 600 ई . पू . 600 ई .(( KINSHIP CASTE AND CLASS IN EARLY SOCIETIES )) ( हड़प्पा सभ्यता ) 12th class History Hindi Notes🌸💮


1️⃣🔹समकालीन समाज को समझने के लिए इतिहासकार प्रायः साहित्यिक परम्पराओं व अभिलेखों का उपयोग करते हैं । 

2️⃣🔹यदि इन ग्रंथो का प्रयोग सावधानी से किया जाए तो समाज में प्रचलित आचार - व्यवहार और रिवाज़ो का इतिहास लिखा जा सकता है । 

3️⃣🔹उपमहाद्वीप के सबसे समृद्ध ग्रथो में से एक ' महाभारत ' जैसे विशाल महाकाव्य के विश्लेषण से उस समय की सामाजिक श्रेणियों तथा आचार - व्यवहार के मानदंडो को जानने का प्रयास । 

4️⃣🔹1919 में प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान वी . एस . सुकथांकर के नेतृत्व में महाभारत का समालोचानत्मक संस्करण तैयार करने की शुरूआत हुई । इस परियोजना को पूरा करने में सैतालीस वर्ष लगें .

5️⃣🔹महाभारत की मूल कथा के रचियता संभवतः भाट सारथी थे जिन्हें सूत कहा जाता था । ये क्षत्रिय योद्धाओं के साथ युद्ध क्षेत्र में जाते थे ।


6️⃣🔹धर्म शास्त्रों व धर्मसूत्रों में चारों वर्णो के लिए आदर्श जीविका बताए गए हैं । 

1) ब्राह्मण - अध्ययन , वेदो की शिक्षा , यज्ञ करना करवाना , दान देना और लेना । 
2) क्षत्रिय युद्ध करना , लोगों की सुरक्षा करना , न्याय करना , वेद पढ़ना , यज्ञ करवाना , दान दक्षिणा देना । 
3) वैश्य - वेद पढ़ना , यज्ञ करवाना , दान - दक्षिणा देना , कृषि गौ पालन और व्यापार कर्म ।
4) शूद्र - तीनों उच्च वर्गों की सेवा करना । 

7️⃣🔹महाभारत की मुख्य कथा वस्तु पितृवंशिकता के आदर्श को सदृढ़ करती है । अधिकतर राजवंश पितृवंशिकता का अनुसरण करते थे । 

8️⃣🔹नए नगरों के उद्भव से सामाजिक जीवन - अधिक जटिल हुआ । इस चुनौती का जवाब ब्राह्मणों ने समाज के लिए विस्तृत आचार संहिता तैयार करके दिया जैसे - धर्मशास्त्र , मनु स्मृति आदि । 

9️⃣🔹ब्राह्मणीय पद्धति में लोगों को गोत्रों में वर्गीकृत किया गया है । प्रत्येक गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर होता था 

1️⃣0️⃣🔹गोत्रों के दो नियम महत्वपूर्ण थे विवाह के पश्चात स्त्रियों को पिता के स्थान पर पति के गोत्र का माना जाता था तथा एक ही गोत्र के सदस्य आपस में विवाह संबंध नहीं रख सकते थे । 

1️⃣1️⃣🔹' जाति ' शब्द इस काल की सामाजिक जटिलताएँ दर्शाता है । ब्राह्ममणीय सिद्धान्त में वर्ण की तरह जाति भी जन्म पर आधारित थी । 

1️⃣2️⃣🔹उपमहाद्वीप में पाई जाने वाली कुछ विविधताओं की वजह से कुछ समुदायों जैसे - निषाद , मलेच्छ आदि पर ब्राह्मणीय विचारों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा । 

1️⃣3️⃣🔹ब्राह्मणों ने समाज के कुछ वर्गो को ' अस्पृश्य ' घोषित कर ( जैसे चाण्डाल ) सामाजिक वैमनस्य को और अधिक प्रखर बनाया । 

1️⃣4️⃣🔹मनु स्मृति में चाण्डालों के कर्त्तव्यों की सूची मिलती है । 

1️⃣5️⃣🔹मनुस्मृति के अनुसार पैतृक जायदाद का माता - पिता की मृत्यु के बाद सभी पुत्रों में समान रुप से बंटवारा किया जाना चाहिए किनतु ज्येष्ठ पुत्र को विशेष भाग का अधिकार था । 

1️⃣6️⃣🔹धर्मशास्त्र और धर्मसूत्र विवाह के आठ प्रकारों की अपनी स्वीकृति देते हैं । इनमें से पहले चार उत्तम माने जाते थे और बाकियों की निंदित माना गया ।

1️⃣7️⃣🔹ब्राह्मणीय सिद्धांत में वर्ण की तरह जाति भी जन्म पर आधारित थी , किंतु वर्ण जहां मात्र चार थे वहीं जातियों की कोई निश्चित संख्या नहीं थी । वस्तुतः जहां कही भी ब्राह्मणीय व्यवस्था की नए समुदायों से आमना - सामना हुआ , यथा निषाद , सुवर्णकार , उन्हें चार वर्णों वाली व्यवस्था में समाहित करना संभव नहीं था , उनका जाति में वर्गीकरण कर दिया गया । 

1️⃣8️⃣🔹ब्राह्मणीय वर्ण - व्यवस्था की आलोचनाएँ प्रारम्भिक बौद्ध धर्म में विकसित हुई । बौद्ध धर्म ने सामाजिक विषमता की उपस्थिति को स्वीकार किया किंतु यह भेद न तो नैसर्गिक थे और नहीं स्थायी । बौद्धों ने जन्म के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा को अस्वीकार किया । 

1️⃣9️⃣🔹नए नगरों के उद्भव से सामाजिक जीवन अधिक जटिल हुआ । नगरीय परिवेश में विचारों का भी आदान - प्रदान होता था । संभवतः इस वजह से आरंभिक विश्वासों और व्यवहारों पर प्रश्नचिन्ह लगाए गए । 

2️⃣0️⃣🔹स्त्रियाँ पैतृक संसाधन में हिस्सेदारी की मांग नहीं कर सकती थी परन्तु स्त्रीधन पर उनका स्वामित्व माना जाता था । 

2️⃣1️⃣🔹इतिहासकार किसी ग्रंथ का विश्लेषण करते समय अनेक पहलुओं पर विचार करते हैं जैसे ग्रंथ की भाषा , काल प्रकार ग्रंथ किसने लिखा , क्या लिखा गया और किनके लिए लिखा गया । 

2️⃣2️⃣🔹महाभारत एक गतिशील ग्रंथ है , क्योंकि शताब्दियों तक इस महाकाव्य में अनेक पाठान्तर भिन्न - भिन्न भाषाओं में लिखें गए , क्षेत्र विशेष की कहानियाँ इसमें समाहित कर ली गयी । इसकी अनेक पुनर्व्याख्याएँ की गई । इस महाकाव्य ने मूर्तिकला , चित्रकला , नृत्यकला व नाटकों के लिए विषय वस्तु प्रदान की ।



भाग एक


भाग दो 

भाग तीन


हमारी website पर आने के लिए धन्यवाद।
Please share your experience
 


🙏🙏🙏🙏🙏🙏

Share this

Related Posts

Previous
Next Post »