12th class economic chapter-1 notes in hindi 2nd book Indian Economy on the Eve of Independence अध्याय - 1 भारत का आर्थिक विकास

12th class economic chapter-1 notes in hindi 2nd book Indian Economy on the Eve of Independence अध्याय - 1 भारत का आर्थिक विकास 


CBSE Revision Notes for CBSE Class 12 Economics Indian Economy on the Eve of Independence Low level of economic development under the colonial rule- agricultural sector, industrial sector, foreign trade, demographic condition, occupational structure, infrastructure.

12th class economic Chapter - 1 Indian Economy on the Eve of Independence notes in Hindi medium

 12th class economic Chapter - 1 Indian Economy on the Eve of Independence notes in Hindi medium

📚📚 अध्याय - 1 📚📚 
📑📑 भारत का आर्थिक विकास 📑📑

🔹 " स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था " 

ब्रिटिश उपनिवेश काल से पूर्व भारत की अर्थव्यवस्था " सोने की चिड़िया ' के रूप में जानी जाती थी । उपनिवेश काल में अत्यधिक और लगातार आर्थिक शोषण के कारण पिछडती चली गई । अंग्रेजी औपनिवेशिक शासन का मुख्य उदेश्य भारत को ब्रिटेन में तेजी से विकसित हो रही आधुनिक अर्थव्यवस्था के लिए आधार के रूप में उपयोग करना था ।

🔹 स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति :- 

क ) आर्थिक विकास की निम्न दर :-

• औपनिवेशिक सरकार ने कभी भी भारत की राष्ट्रीय तथा प्रति व्यक्ति आय के अनुमान के लिए कोई प्रयास नहीं किए ।

• राष्ट्रीय आय तथा प्रति व्यक्ति आय के मापन का प्रथम प्रयास व्यक्तिगत स्तर पर 1876 में भारत के " ग्रेण्ड ओल्डमैन ' दादा भाई नौरोजी ने किया । 

• डॉ . वी . के . आर . वी . राव के अनुसार सकल देशीय उत्पद में वार्षिक वृद्धि दर केवल 2 % तथा प्रति व्यक्ति आय में वार्षिक वद्धि केवल 0 . 5 % थी । 1947 में प्रति व्यक्ति आय मात्र 280 रूपये थी । 

• तत्तकालीन राष्ट्रीय आय के अन्य अनुकर्ताओं में प्रमुख थे - विलियम डिग्बी , फिण्डले सिराज , आर . डी . सी . देशाई आदि । 

ख ) कृषि का पिछड़ापन : - जिसके निम्न कारण थे - 

• जमींदारी , महलवाड़ी तथा रैयतवाड़ी प्रथा 

•  1947 में राष्ट्रीय आय में कृषि क्षेत्र की भागीदारी लगभग 95 % थी । 

•  व्यवसायीकरण का दबाव - नील आदि का उत्पादन ।

•  1947 में 75 % से अधिक जनसंख्या कृषि क्षेत्र पर निर्भर थी ।

•  देश के विभाजन के कारण पश्चिम बंगाल में जूट मिल और पूर्वी पाकिस्तान में उत्पादक भूमि चली गयी तथा विनिर्मित निर्यात में । की और आयात में वृद्धि


ग ) अविकसित औद्योगिक क्षेत्र : 

• वि - औद्योगिकीकरण नीति तथा भारतीय हस्तकला उद्योग का पतन

• वि - औद्योगिकीकरण नीति के दोहरे ( जुड़वाँ ) उद्देश्य थे 
( i ) भारत को कच्चे माल का निर्यातक बनाना 
( ii ) भारत को ब्रिटिश उद्योगों के विनिर्मित उत्पादों का आयातक या बाजार बनाना । 

• पूंजीगत वस्तुओं के उद्योग का अभाव

•  सार्वजनिक क्षेत्र की सीमित क्रियाशीलता 

• भेदभावपूर्ण टैरिफ नीति 

• हस्तशिल्प उद्योगों के पतन व प्रमुख दुष्परिणाम 

1 . भारत में भीषण बेरोजगारी 
2 . भारतीय उपभोक्ता बाजार में नयी माँग का सृजन 
3 . स्थानीय निर्मित वस्तुओं की आपूर्ति में भारी कमी 
4 . ब्रिटेन से सस्ते विनिर्मित उत्पादों के आयात में भारी वृद्धि इसके अलावा यद्यपि आधुनिक उद्योग जैसे 1907 में टिस्को की स्थापना जमशेद जी टाटा द्वारा की गयी परन्तु ऐसे प्रयास बहुत कम एवं अपर्याप्त थे । 

घ ) विदेशी व्यापार की विशेषताएं : 

• कच्चे माल का शुद्ध निर्यातक तथा तैयार माल का आयातक 
• विदेशी व्यापार पर ब्रिटेन का एकाधिकारी नियंत्रण 
• भारत की सम्पत्ति का बहिप्रवाह 

च ) ब्रिटेन द्वारा लडे जा रहे युद्धो के व्यय का भारत पर दवाव 

• भारत की पहली नियमित जनगणना 1881 में प्रारम्भ हुई । 1981 से 1991 तक भारत की जनांकीकिय दशा को जनाँकीकिय संक्रमण सिद्वांत के प्रथम चरण में रखा जाता है । 1921 को जनसंख्या महाविभाजक वर्ष कहा जाता है । जिसके बाद जनांकीकिय संनुमण का इससे चरण शुरू होता है ।

छ ) प्रतिकूल तत्कालीन जनांकिकीय दशाएँ :

•  ब्रिटेन द्वारा लड़े जा रहे युद्धों पर भारत पर दवाव । भारत को पहली नियमित जनगणना 1881 में प्रारम्भ हुई । 1981 से 1919 तक भारत को जनांकीकिल दशा को जनांकीकिय संकमण सिद्धांत के प्रथम चरण में रखा जाता है । 1921 को जनसख्या महाविभाजक वर्ष कहा जाता है । जिसके बाद जनांकीकीय उसके चरण शुरू हुए है । 

• ऊँची मृत्युदर - 45 प्रति हजार 
• उच्च शिशु जन्म दर - 218 प्रति हजार 
• सामूहिक निरक्षरता - 84 निरक्षरता 
• निम्न जीवन प्रत्याशा - 32 वर्ष
• जीवन - यापन का निम्न स्तर - आय का 80 - 90 % आधारभूत आवश्यकता पर व्यय 
• जन स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव

ज ) अविकसित आधारभूत ढाँचा : - 

अच्छी सड़कें , विद्युत उत्पादन , स्वास्थ्य , शिक्षा तथा संचार सुविधाओं का अभाव । यद्यापि अंग्रेज प्रशासकों द्वारा आधारभूत ढाँचे के विकास के लिए प्रयास किए गए जैसे - सड़कें , रेलवे , बंदरगाह , जल यातायात और डाक व तार विभाग । लेकिन इनका उददेश्य आम जनता को सुविधाएं देना नहीं था बल्कि साम्राज्यवादी प्रशासन के हित में था । 

झ ) प्राथमिक ( कृषि ) क्षेत्र पर अधिक निर्भरता : 

• कार्यबल का अधिकतम भाग लगभग 72 % कृषि एवं संबंधित क्षेत्र में लगा था । 
• 10 % विनिर्माण क्षेत्र में लगा था । 
• 18 % कार्यबल सेवा क्षेत्र मे लगा था । 

🔹 अंग्रेजी साम्राज्यवाद के भारतीय अर्थव्यवस्था पर कुछ सकारात्मक प्रभाव :

क ) यातायात की सुविधाओं में वृद्धि - विशेषकर रेलवे में 
ख ) बंदरगाहों का विकास 
ग ) डाक व तार विभाग की सुविधाएँ 
घ ) देश का आर्थिक व राजनीतिक एकीकरण 
ड़ ) बैंकिंग व मौद्रिक व्यवस्था का विकास

🔹 अंग्रेजी साम्राज्यवाद के भारतीय अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव : 

क ) भारतीय हस्तकला उद्योग का पतन 
ख ) कच्चे माल का निर्यातक व तैयार माल का आयातक 
ग ) विदेशी व्यापार पर ब्रिटेन का एकाधिकारी नियंत्रण 
घ ) व्यवसायीकरण पर दबाव

12th class economic notes in hindi Ist book chapter-1 Development Experience (1947-90) and Economic Reforms since 1991

12th class economic notes in hindi Ist book chapter-1  Development Experience (1947-90) and Economic Reforms since 1991 अध्याय - 1 राष्ट्रीय आय एवं सम्बद्ध समाहार



CBSE Revision Notes for CBSE Class 12 Economics Indian Economy 1950-90 Indian economy 1950-1990- and Economic Reforms since 1991  the goals of five year plans, agriculture, industry and trade, trade policy: import substitution. Economic Planning: Means utilisation of country’s resources in different development activities in accordance with national priorities.


12th class economic Chapter - 1 Development Experience (1947-90) and Economic Reforms since 1991 notes in Hindi medium


12th class economic Chapter - 1 Development Experience (1947-90) and Economic Reforms since 1991 notes in Hindi medium

📚📚 अध्याय - 1 📚📚
📑📑 राष्ट्रीय आय एवं सम्बद्ध समाहार 📑

🔹 उपभोक्ता वस्तुएँ :-

वे अंतिम वस्तुएँ और सेवायें जो प्रत्यक्ष रूप से उपभोक्ता की मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं । उपभोक्ता द्वारा क्रय की गई वस्तुएँ और सेवाएँ उपभोक्ता वस्तुएँ हैं । 

🔹 पूँजीगत वस्तुएँ :- 

ये ऐसी अंतिम वस्तुएँ हैं जो उत्पादन में सहायक होती हैं तथा आय सृजन के लिए प्रयोग की जाती हैं । ये उत्पादक की पूँजीगत परिसंपत्ति में वृद्धि करती हैं । 

🔹 अंतिम वस्तुएँ :-

वे वस्तुएँ जो उपभोग व निवेश के लिए उपलब्ध होती हैं ये पुनर्विक्रय या मूल्यवर्द्धन के लिए नहीं होती । उपभोक्ता द्वारा उपयोग की गई सभी वस्तुएँ व सेवाएँ अंतिम वस्तुएँ होती हैं । 

🔹 मध्यवर्ती वस्तुएँ :- 

ये ऐसी वस्तुएँ और सेवायें हैं , जिनकी एक ही वर्ष में पुनः बिक्री की जा सकती हैं या अंतिम वस्तुओं के उत्पादन में कच्चे माल के रूप में प्रयोग की जाती हैं या जिनका रूपांतरण संभव है । ये प्रत्यक्ष रूप से मानव आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं करती । उत्पादक द्वारा प्रयोग की गई सेवाएँ जैसे वकील की सेवाएँ : कच्चे माल उपयोग ।

🔹 निवेश :-

एक निश्चित समय में पूंजीगत वस्तुओं के स्टॉक में वृद्धि निवेश कहलाता है । इसे पूंजी निर्माण या विनियोग भी कहते हैं । 

🔹 मूल्यह्रास :-

 सामान्य टूट - फूट या अप्रचलन के कारण अचल परिसंपत्तियों के मूल्य में गिरावट को मूल्यह्रास या अचल पूंजी का उपभोग कहते हैं । मूल्यहास , स्थायी पूंजी के मूल्य को उसकी अनुमानित आयु ( वर्षों में ) से भाग करके ज्ञात किया जाता है ।


🔹 सकल निवेश :-

एक निश्चित समयावधि में पूँजीगत वस्तुओं के स्टॉक में कुल वृद्धि सकल निवेश कहलाती है । इसमें मूल्यहास शामिल होता है । 

🔹 निवल निवेश :-

एक अर्थव्यवस्था में एक निश्चित समयावधि में पूंजीगत वस्तुओं के स्टॉक में शुद्ध वृद्धि निवल निवेश कहलाता है । इसमें मूल्यह्रास शामिल नहीं होता है । 

निवल निवेश = सकल निवेश - घिसावट ( मूल्य ह्रास ) 

🔹 आय के चक्रीय प्रवाह :-

अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों के बीच वस्तुओं एवं सेवाओं एवं साधन सेवाओं तथा मौद्रिक आय के सतत् प्रवाह को आय का चक्रीय प्रवाह कहते हैं । इसकी प्रकृति चक्रीय होती है क्योंकि न तो इसका कोई आरम्भिक बिन्दु है और न ही कोई अन्तिम बिन्दु । वास्तविक प्रवाह उत्पादित सेवाओं तथा वस्तुओं और साधन सेवाओं का प्रवाह दर्शाता है । मौद्रिक प्रवाह उपभोग व्यय और साधन भुगतान के प्रवाह को दर्शाता है । 

🔹 स्टॉक :-

 स्टॉक एक ऐसी मात्रा ( चर ) है जो किसी निश्चित समय बिन्दु पर मापी जाती है । जैसे राष्ट्रीय धन एवं सम्पत्ति , मुद्रा की आपूर्ति आदि । 

🔹प्रवाह  :-

 प्रवाह एक ऐसी मात्रा ( चर ) है जिसे समय अवधि में मापा जाता है ; जैसे राष्ट्रीय आय ; निवेश आदि ।

🔹 आर्थिक सीमा :-

 यह सरकार द्वारा प्रशासित व भौगोलिक सीमा है जिसमें व्यक्ति , वस्तु व पूँजी का स्वतंत्र प्रवाह होता है । 

🔹 आर्थिक सीमा क्षेत्र :-

 1 . राजनैतिक , समुद्री व हवाई सीमा । 
2 . विदेशों में स्थित दूतावास , वाणिज्य दूतावास , सैनिक प्रतिष्ठान , राजनयिक भवन आदि । 
3 . जहाज तथा वायुयान जो दो देशों के बीच आपसी सहमति से चलाए जाते 
4 . मछली पकड़ने की नौकाएँ , तेल व गैस निकालने वाले यान तथा तैरने वाले प्लेटफार्म जो देशवासियों द्वारा चलाए जाते हैं ।

🔹 सामान्य निवासी :-

 किसी देश का सामान्य निवासी उस व्यक्ति अथवा संस्था को माना जाता है जिसके आर्थिक हित उसी देश की आर्थिक सीमा में केन्द्रित हों जिसमें वह सामान्यतः एक वर्ष से रहता है । 

🔹 उत्पादन का मूल्य :-

एक उत्पादन इकाई द्वारा एक लेखा वर्ष में उत्पादित सभी वस्तुओं व सेवाओं का बाजार मूल्य उत्पादन का मूल्य कहलाता है । 

उत्पादन का मूल्य = बेची गई इकाई x बाजार कीमत + स्टॉक में परिवर्तन । 


🔹 साधन आय :-

 उत्पादन के साधनों ( श्रम , भूमि , पूँजी तथा उद्यम ) द्वारा उत्पादन प्रक्रिया में प्रदान की गई सेवाओं से प्राप्त आय , साधन आय कहलाती है । जैसे , वेतन व मजदूरी , किराया , ब्याज आदि । 

🔹 हस्तांतरण भुगतान :- 

यह एक पक्षीय भुगतान होते हैं जिनके बदले में कुछ नहीं मिलता है । बिना किसी उत्पादन सेवा के प्राप्त आय । जैसे वृद्धावस्था पेंशन , कर , छात्रवृत्ति आदि । 

🔹 पूँजीगत लाभ :-

पूँजीगत सम्पत्तियों तथा वित्तीय सम्पत्तियों के मूल्य में वृद्धि , जो समय बीतने के साथ होती है , यह क्रय मूल्य से अधिक मूल्य होता है । यह सम्पत्ति की बिक्री के समय प्राप्त होता है । 

🔹 कर्मचारियों का पारिश्रमिक :-

श्रम साधन द्वारा उत्पादन प्रक्रिया में प्रदान की गई साधन सेवाओं के लिए किया गया भुगतान ( नगर व वस्तु ) कर्मचारियों का पारिश्रमिक कहलाता है । इसमें वेतन , मजदूरी , बोनस , नियोजकों द्वारा सामाजिक सुरक्षा में योगदान शामिल होता है । 

🔹 परिचालन अधिशेष :-

 उत्पादन प्रक्रिया में श्रम को कर्मचारियों का पारिश्रमिक का भुगतान करने के पश्चात् जो राशि बचती है । यह किराया , ब्याज व लाभ का योग होता है । | 


📚 घरेलू समाहार GDP 📚

🔹 बाज़ार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद ( GDPmp ) : एक वर्ष की अवधि में अर्थव्यवस्था के घरेलू सीमा के अन्तर्गत उत्पादित समस्त अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के बाजार मूल्यों के योग को बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद कहते हैं ।

🔹 बाजार कीमत पर निवल देशीय उत्पाद ( NDPmp ) : 

NDPMP = GDPMP - मूल्यह्रास

🔹 साधन लागत पर निवल देशीय आय ( NDPFc ) : एक अर्थव्यवस्था की घरेलू सीमा में एक लेखा वर्ष में उत्पादन कारकों की आय का योग , जो कारकों द्वारा प्रदान की गई सेवाओं के बदले प्राप्त होती है को देशीय आय कहते हैं । 

NDPFC = GDPMP - मूल्यह्रास - निवल अप्रत्यक्ष कर ।


📚 राष्ट्रीय समाहार 📚  

🔹 बाजार कीमत पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद ( GNPmp ) : एक देश के सामान्य निवासियों द्वारा एक वर्ष में देश की घरेलू सीमा व विदेशों में उत्पादित अंतिम वस्तुओं व सेवाओं के बाजार मूल्यों के योग को GNPMp कहते हैं । 

🔹 बाजार कीमत पर निवल राष्ट्रीय उत्पाद ( NNPMp ) : .

NNPMP = GNPMP - मूल्यह्रास 

🔹 राष्ट्रीय आय ( NNPFC ) : एक देश के सामान्य निवासियों द्वारा एक लेखा वर्ष में देश की घरेलू सीमा व शेष विश्व से अर्जित साधन आय का योग राष्ट्रीय आय कहलाती है । 

NNPFC = NDPFC + NFIA = राष्ट्रीय आय 

🔹 क्षरण :- आय के चक्रीय प्रवाह से निकाली गई राशि ( मुद्रा के रूप में ) की क्षरण कहते हैं ; जैसे कर , बचत तथा आयात को क्षरण कहते हैं । 

🔹 भरण :- आय के चक्रीय प्रवाह में डाली गई राशि ( मुद्रा की मात्रा ) को भरण कहते हैं ; जैसे निवेश , सरकारी व्यय , निर्यात । 

🔹 वर्धित मूल्य ( मूल्यवृद्धि ) :- किसी उत्पादन इकाई द्वारा निश्चित समय में किए गए उत्पादन के मूल्य तथा प्रयुक्त मध्यवर्ती उपभोग के मूल्य का अंतर वर्धित मूल्य कहलाता है ।


🔹 दोहरी गणना की समस्या :- राष्ट्रीय आय आंकलन में जब किसी वस्तु के मूल्य की एक से अधिक बार गणना की जाती है उसे दोहरी गणना कहते हैं । इससे राष्ट्रीय आय अधिमूल्यांकन दर्शाता है । इसलिए इसे दोहरी गणना की समस्या कहते हैं । 

🔹 कुछ महत्वपूर्ण समीकरण : 

✴️ सकल = निवल ( शुद्ध ) + मूल्यह्रास ( स्थायी पूँजी का उपभोग ) 
✴️ राष्ट्रीय = घरेलू + विदेशों से प्राप्त निवल साधन आय । 
✴️ बाजार कीमत = साधन लागत + निवल अप्रत्यक्ष कर ( NIT )
✴️ निवल अप्रत्यक्ष कर ( NIT ) = अप्रत्यक्ष कर - सहायिकी ( आर्थिक सहायता ) 
✴️ विदेशों से शुद्ध साधन आय ( कारक ) = विदेशों से साधन आय - विदेशों को साधन आय

 राष्ट्रीय आय अनुमानित ( मापने ) करने की विधियाँ
📚 आय विधि 📚

🔹 प्रथम चरण :-

 साधन लागत पर निवल घरेलू उत्पाद / निवल घरेलू साधन आय ( NDPFC ) = कर्मचारियों का पारिश्रमिक + प्रचालन अधिशेष + स्वयं नियोजितों की मिश्रित आय । 

🔹 द्वितीय चरण:- 

साधन लागत पर निवल राष्ट्रीय उत्पाद । राष्ट्रीय आय = साधन लागत पर निवल घरेलू उत्पाद + विदेशों से प्राप्त निवल साधन आय ।

NNPFc = NDPFC + NFIA

 उत्पाद विधि अथवा मूल्य वर्द्धित विधि

🔹  प्रथम चरण :-

बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद = प्राथमिक क्षेत्र द्वारा सकल वर्धित मूल्य + द्वितीयक क्षेत्र द्वारा सकल वर्धित मूल्य + तृतीयक क्षेत्र द्वारा सकल वर्धित मूल्य ।

या 

बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद ( GDPMP ) = बिक्री + स्टॉक में परितर्वन - मध्यवर्ती उपभोग ।

🔹 द्वितीय चरण:-

बाजार कीमत पर निवल घरेलू उत्पाद NDPMP= बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद GDPMP - मूल्यह्रास । 

🔹 तृतीय चरण:-

 साधन लागत पर निवल घरेलू उत्पाद ( NDPFC) = बाजार कीमत पर निवल घरेलू उत्पाद ( NDPMP ) - शुद्ध अप्रत्यक्ष कर ( NIT )

🔹  चतुर्थ चरण :-

साधन लागत पर निवल राष्ट्रीय उत्पाद / राष्ट्रीय आय ( NNPFC) - साधन लागत पर निवल घरेलू उत्पाद ( NDPFC ) + विदेशों से प्राप्त निवल साधन आय ( NFIA )

📚 व्यय विधि 📚

 🔹 प्रथम चरण :-

बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद = निजी अंतिम उपयोग व्यय + सरकारी अंतिम उपयोग व्यय + सकल घरेलू पूँजी निर्माण + शुद्ध / निवल निर्यात्

GDPMp = C + G + I + ( X - M )

🔹  द्वितीय चरण :-

बाजार कीमत पर निवल घरेलू उत्पाद ( NDPMP ) = बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद (GDPMP  ) - मूल्यह्रास ।

🔹 तृतीय चरण :-

 साधन लागत पर निवल घरेलू उत्पाद (NDPFC  ) = बाजार कीमत पर निवल घरेलू उत्पाद ( NDPMP ) - शुद्ध अप्रत्यक्ष कर ( NIT )

🔹 चतुर्थ चरण :-

साधन लागत पर निवल राष्ट्रीय उत्पाद / राष्ट्रीय आय ( NNPFC ) = साधन लागत पर निवल घरेलू उत्पाद ( NDPFC ) + विदेशों से प्राप्त निवल साधन आय ( NFIA )

🔹 विदेशों से प्राप्त निवल साधन आय ( NFIA ) :- 

देश के सामान्य निवासियों द्वारा विदेशों को प्रदान की गई साधन सेवाओं से प्राप्त आय तथा विदेशों को दी गई साधन आय के बीच के अंतर को विदेशों से प्राप्त निवल साधन आय कहते हैं । इसके निम्न घटक होते हैं

1 . कर्मचारियों का निवल पारिश्रमिक
2 . सम्पत्ति तथा उद्यमवृत्ति से निवल आय तथा
3 . विदेशों से निवासी कम्पनियों की शुद्ध प्रतिधारित आय ।

🔹 चालू हस्तांतरण :-

वह गैर - अर्जित आय जो देने वाले ( Doner ) के चालू आय में से निकलता है और प्राप्त करने वाले ( Recipient ) के चालू आय में जोड़ा जाता है , उसे चालू हस्तांतरण आय कहते हैं ।

🔹 पूँजीगत हस्तांतरण :- 

वह गैर - अर्जित आय जो देने वाले के धन तथा पूँजी से निकलता है तथा प्राप्त करने वाले के धन तथा पूँजी में शामिल होता है , उसे पूंजीगत हस्तांतरण कहते हैं ।

12th class economic Chapter - 1 Development Experience (1947-90) and Economic Reforms since 1991 notes in Hindi medium
12th class economic Chapter - 1 Development Experience (1947-90) and Economic Reforms since 1991 notes in Hindi medium

📚 सावधानियां 📚 

1 . मूल्यवर्द्धित विधिः-

( i ) दोहरी गणना का त्याग ।
( ii ) वस्तुओं के पुनः विक्रय को सम्मिलित नहीं करते ।
( iii ) स्वउपयोग के लिए उत्पादित वस्तु को सम्मिलित किया जाता है ।

2 . आय विधिः -

( i ) हस्तांतरण आय को सम्मिलित नहीं करते है
( ii ) पूजीगत लाभ को सम्मिलित नहीं करते ।
( iii ) स्वउपयोग उत्पादित वस्तु से उत्पन्न आय को सम्मिलित करते हैं ।
( iv ) उत्पाद कर्ता द्वारा प्रस्तु मुफ्त सेवाओं को सम्मिलित करते हैं ।


3 . व्यय विधिः-

( i ) मध्यवर्ती व्यय को सम्मिलित नहीं
( ii ) पूनः विक्रय वस्तुओं पर रूपको सम्मिलित नहीं करते ।
( iii ) वित्तिय परिसम्पतियों पर व्यय सम्मिलित नहीं करते ।
( iv ) हस्तांत्तरण भुगतान का त्याग

GDP का स्वरूप दो प्रकार का होता है ।

1 . वास्तविक GDP : एक अर्थव्यवस्था की घरेलू सीमा के अंतर्गत एक वर्ष की अवधि में उत्पादित सभी अंतिम वस्तओं एवं सेवाओं का , यदि मूल्यांकन आधार वर्ष की कीमतों ( स्थिर कीमतों ) पर किया जाता है तो उसे वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद कहते हैं । इसे स्थिर कीमतों पर सकल घरेलू उत्पाद भी कहते हैं । यह केवल उत्पादन मात्रा में परिवर्तन के कारण परिवर्तित होता हैं इसे आर्थिक विकास का एक सूचक माना जाता है ।

2 . मौद्रिक GDP : एक अर्थव्यवस्था की घरेलू सीमा के अंतर्गत एक वर्ष की अवधि में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं का , यदि मूल्यांकन चालू वर्ष की कीमतों ( चालू कीमतों ) पर किया जाता है तो उसे मौद्रिक GDP कहते हैं । इसे चालू कीमतों पर GDP भी कहते हैं । यह उत्पादन मात्रा तथा कीमत स्तर दोनों में परिवर्तन से प्रभावित होता है । इसे आर्थिक विकास का एक सूचक नहीं माना जाता है ।

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चूँकि कीमत सूचकांक चालू कीमत अनुमानों को घटाकर स्थिर कीमत अनुमान के रूप में लाने हेतु एक अपस्फायक की भूमिका अदा करता है । इसलिए इसे सकल घरेलू उत्पाद अपस्फायक कहा जाता है ।

🔹 सकल घरेलू उत्पाद एवं कल्याण :- सामान्यतः सकल घरेलू उत्पाद एवं कल्याण में प्रत्यक्ष संबंध होता है । उच्चतर GDP का अर्थ है वस्तुओं एवं सेवाओं के अधिक उत्पादन का होना । इसका तात्पर्य है कि वस्तुओं एवं सेवाओं की अधिक उपलब्धता । परन्तु इसका अर्थ यह निकालना कि लोगों का कल्याण पहले से अच्छा है , आवश्यक नहीं है । दूसरे शब्दों में , उच्चतर GDP का तात्पर्य लोगों के कल्याण में वृद्धि का होना , आवश्यक नहीं है ।

🔹 कल्याण :- इसका तात्पर्य लोगों के भौतिक सुख - सुविधाओं से है । यह अनेक आर्थिक एवं गैर - आर्थिक कारकों पर निर्भर करता है । आर्थिक कारक जैसे राष्ट्रीय आय , उपभोग का स्तर आदि और गैर - आर्थिक कारक जैसे पर्यावरण प्रदूषण , कानून व्यवस्था , सामाजिक अशांति आदि । वह कल्याण जो आर्थिक कारकों पर निर्भर करता है उसे आर्थिक कल्याण तथा जो गैर - आर्थिक कारकों पर निर्भर करता है उसे गैर आर्थिक कल्याण कहा जाता है । दोनों के योग को सामाजिक कल्याण कहा जाता है ।

🔹  निष्कर्ष :- दोनों में अर्थात् GDP एवं कल्याण में प्रत्यक्ष सम्बन्ध है परन्तु यह संबंध निम्नलिखित कारणों से अपूर्ण एवं अधूरा है । GDP को आर्थिक कल्याण के सूचक के रूप में सीमाएँ निम्न हैं

1 . बाह्यताएँ : इससे तात्पर्य व्यक्ति या फर्म द्वारा की गई उन क्रियाओं से है जिनका बुरा ( या अच्छा ) प्रभाव दूसरों पर पड़ता है लेकिन इसके लिए उन्हें दण्डित ( लाभान्वित ) नहीं किया जाता । उदाहरण - कारखानों का धुंआ ( नकारात्मक बाह्यताएँ ) तथा फ्लाईओवर का निर्माण ( सकारात्मक बाह्यताएँ ) ।

2 . GDP की संरचना : यदि GDP में वृद्धि , युद्ध सामग्री के उत्पादन में वृद्धि के कारण हैं तो GDP में वृद्धि से कल्याण में वृद्धि नहीं होगी ।

3 . GDP का वितरण : GDP में वृद्धि से कल्याण में वृद्धि नहीं होगी यदि _ _ _ आय का असमान वितरण है , अमीर अधिक अमीर हो जाएंगे तथा गरीब अधिक गरीब हो जाएंगे ।

4 . गैर - माद्रिक लेन - देन : GDP में कल्याण को बढ़ाने वाले गैर मौद्रिक लेन - देन को शामिल नहीं किया जाता है ।

12th class economic notes in hindi 1st book chapter-5 Balance of Payments & Foreign Exchange अध्याय - 5 भुगतान शेष

12th class economic notes in hindi 1st book chapter-5  Balance of Payments & Foreign Exchange अध्याय - 5 भुगतान शेष

CBSE Revision Notes in hindi for CBSE Class 12 Economics Balance of Payments & Foreign Exchange The Balance of Payments: BoP Surplus and Deficit, The Foreign Exchange Market- Determination of the Exchange Rate, Flexible Exchange Rates, Fixed Exchange Rates, Managed Floating, Exchange Rate Management: The International Experience. The Determination of Income in an Open Economy- National Income Identity for an Open Economy, Equilibrium Output and the Trade Balance. Trade Deficits, Savings and Investment

12th class economic Chapter - 5 Balance of Payments & Foreign Exchange notes in Hindi medium


12th class economic Chapter - 5 Balance of Payments & Foreign Exchange notes in Hindi medium


📚📚 अध्याय - 5  📚📚
📑📑 भुगतान शेष 📑📑

✴️ भुगतान शेष :-  

भुगतान शेष एक वर्ष की अवधि में किसी देश के सामान्य निवासियों और शेष विश्व के बीच समस्त आर्थिक लेन - देनों का एक विस्तृत एवं व्यवस्थित विवरण होता है । इसे विदेशी विनिमय के वार्षिक अन्त : प्रवाह तथा बाह्य प्रवाह का लेखा भी कहा जाता है ।

🔹 भुगतान शेष के घटक :-

🔹 चालू खाता :-

इस खाते में वस्तुओं व सेवाओं के निर्यात एवं आयात और चालू अन्तरणों की प्राप्तियों व भुगतान के विवरण दर्ज होते हैं ।

🔹 पूँजीगत खाता :-

इस खाते में परिसम्पत्तियों जैसे मुद्रा स्टॉक , बन्ध पत्र आदि अर्थात् किसी अर्थव्यवस्था और शेष विश्व के बीच परिसम्पत्तियों एवं दायित्वों के स्वामित्व का हस्तांतरण शामिल होते हैं ।

🔹 चालू खाते की मदें :-

1 . दृश्य मदें ( वस्तुओं का आयात - निर्यात ) 
2 . अदृश्य मदें ( सेवाओं का आदान - प्रदान ) 
3 . एक पक्षीय अन्तरण


🔹 पूँजीगत खाते की मदें :-

1 . प्रत्यक्ष विदेशी निवेश , पोर्टफोलियो निवेश 
2 . विदेशी ऋण
3 . विदेशी मुद्रा कोष में परिवर्तन पूँजीगत खाते की मदें सम्पत्ति व दायित्वों में परिवर्तन लाती हैं ।

🔹 व्यापार शेष :-

किसी देश के सामान्य निवासियों ओर शेष विश्व के बीच दृश्य मदों ( वस्तुओं ) के आयात तथा निर्यात का अन्तर होता है । 

🔹 स्वायत्त सौदों :-

से अभिप्राय उन आर्थिक लेन देनों से है जिन्हें लाभ के उद्देश्य से किया जाता है । इनका उद्देश्य भुगतान शेष खाते में सन्तुलन बनाए रखना नहीं होता । इन्हे रेखा के ऊपर की मदें कहा जाता है ।

🔹  समायोजन मदें :- 

वे आर्थिक सौदें हैं जिन्हें किसी देश की सरकार द्वारा भुगतान शेष को सन्तुलित बनाए रखने के लिए किया जाता है , इनका उद्देश्य भुगतान शेष खाते के असन्तुलन को दूर करना होता है , इन्हें रेखा के नीचे की मदें भी कहा जाता है । 

🔹 भुगतान शेष में घाटा :- 

जब स्वायत्त प्राप्तियों का मूल्य , स्वायत्त भुगतान के मूल्य से कम हो जाता है तो भुगतान शेष में घाटा कहते हैं । 

🔹 विनिमय दर :-

एक देश की करेन्सी का जिस दर पर दूसरे देश की करेन्सी से विनिमय किया जाता है उसे विदेशी विनिमय दर कहते हैं । 

🔹 स्थिर विदेशी विनिमय दर :- 

वह विदेशी विनिमय दर जिसका निर्धारण या तो देश की सरकार या मौद्रिक अथॉरिटी ( केन्द्रीय बैंक ) करें उसे स्थिर विदेशी विनिमय दर कहते हैं । 

🔹 लोचशील या नम्य विनिमय दर :-

लोचशील या नम्य विनिमय दर का निर्धारण विदेशी विनिमय की मांग तथा पूर्ति की शक्तियों पर निर्भर करता है । विदेशी मुद्रा की मांग तथा नम्य विनिमय दर में विपरीत सम्बन्ध होता है । यदि विनिमय दर ऊँची है तो विदेशी मुद्रा की मांग कम होगी और विलोमशः इसके विपरीत विदेशी विनिमय दर व विदेशी मुद्रा की पूर्ति में प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता है । यदि विदेशी विनिमय दर अधिक है , तो विदेशी मुद्रा की पूर्ति अधिक होगी । 

🔹 विदेशी मुद्रा मांग के स्रोत :-

( i ) विदेशों में वस्तुओं व सेवाएँ खरीदने के लिए 
( ii ) विदेशों में वित्तीय परिसम्पत्तियां ( जैसे बांड , शेयर ) खरीदने के लिए 
( iii ) विदेशी मुद्राओं के मूल्यों पर सट्टेबाजी के लिए
( iv ) विदेशो में प्रत्यक्ष निवेश ( जैसे - दुकान , मकान , फैक्टरी खरीदना ) के लिए 

🔹 विदेशी मुद्रा की पूर्ति के स्रोत :-

( i ) विदेशियों द्वारा घरेलू बाजार में प्रत्यक्ष ( वस्तुओं व सेवाओं की ) खरीद 
( ii ) विदेशियों द्वारा प्रत्यक्ष निवेश 
( iii ) विदेशी पर्यटकों का हमारे देश में भ्रमण 
( iv ) विदेशों में रहने वाले अनिवासी भारतीय द्वारा भेजा गया धन या प्रेषणाएँ ( एक पक्षीय हस्तातरण ) 
( v ) वस्तुओं एवं सेवाओं का निर्यात 

🔹 नम्य विनिमय दर के गुण :- 

( i ) विदेशी मुद्राओं के भण्डार की आवश्यकता नहीं 
( ii ) संसाधनों का सर्वोत्तम आबंटन 
( iii ) भुगतान सन्तुलन खाते में स्वतः समायोजन 
( iv ) व्यापार ओर पूँजी के आवागमन में आने वाली रूकावटों को दूर करना 

🔹 नम्य विनिमय दर के दोष :- 

( i ) विदेशी विनिमय दर में अस्थिरता 
( ii ) सट्टेबाजी को बढ़ावा 

🔹 नम्य विनिमय दर का निर्धारण :-

नम्य विनिमय दर प्रणाली के अन्तर्गत , विदेशी विनिमय दर का निर्धारण बाजार शक्तियों द्वारा होता हैं । दूसरे शब्दों में सन्तुलन विनिमय दर का निर्धारण विदेशी मुद्रा की मांग तथा उसकी पूर्ति द्वारा होता है । 

विदेशी विनिमय की मांग तथा विनिमय दर में विपरीत सम्बन्ध होता है । इसलिए विदेशी विनिमय की मांग वक्र ऋणात्मक ढाल की होती है । विदेशी विनिमय की पूर्ति तथा विनिमय दर में धनात्मक ( प्रत्यक्ष ) सम्बन्ध होता है । इसलिए विदेशी विनिमय की पूर्ति वक्र धनात्मक ढाल की होती है । दोनों वक्रों के अतः क्रिया द्वारा सन्तुलन विदेशी विनिमय दर का निर्धारण होता है ।

12th class economic Chapter - 5 Balance of Payments & Foreign Exchange notes in Hindi medium

🔹 सन्तुलन विनिमय दर :-

वह विदेशी विनिमय दर जिस पर विदेशी विनिमय की मांग और पूर्ति दोनों बराबर होते हैं उसे सन्तुलन विदेशी विनिमय दर कहते हैं । चित्र में OR संतुलन विनिमय दर है । 

🔹 प्रबंधित तरणशीलता :- 

एक ऐसी प्रणाली है , जिसमें केन्द्रीय बैंक विदेशी विनिमय दर के निर्धारण को बाजार शक्तियों पर छोड़ देता है परन्तु समय - समय पर आवश्यकता के अनुसार दर को प्रभावित करने के लिए हस्तक्षेप भी करता है । जब विदेशी विनिमय की दर अत्यधिक निम्न हो केन्द्रीय बैंक विदेशी विनिमय का क्रय करना शुरू कर देता है और जब विदेशी विनिमय की दर अधिक हो तो विदेशी विनिमय का विक्रय शुरू कर देता है । 

🔹 अवमूल्यनः- 

जब देश की सरकार अथवा केन्द्रीय बैंक घरेलू मुद्रा का बाह्य मूल्य घटाती है तो उसे अवमूल्यन कहते हैं । इससे आयात महंगी तथा निर्यात सस्ती हो जाती है । सामान्यतः यह स्थिर विनियम दर प्रणाली में होता है । 

🔹 अधिमूल्यनः- 

जब सरकार अथवा केन्द्रीय बैंक घरेलू मुद्रा के बाह्य मूल्य को बढ़ाती है तो मुद्रा का अधिमूल्यन कहलाता हैं । सामान्यतः यह स्थिर विनिमय दर में होता हैं । 

🔹 मुद्रा का मूल्यहास :- 

जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में मुद्रा की माँग तथा पूर्ति के फलस्वरूप घरेलू मुद्रा के मूल्य में विदेशी मुद्रा के मूल्य के सापेक्ष गिरावट आती है तो यह मुद्रा को मूल्यहास कहलाता है । 

🔹 मुद्रा की मूल्यवृद्धि :- 

अंतर्राष्ट्रीय बाजार में , मुद्रा की मांग तथा पूर्ति के फलस्वरूप घरेलू मुद्रा के मूल्य में विदेशी मुद्रा के सापेक्ष बढ़ोतरी होती है तो यह मुद्रा की मूल्यवृद्धि कहलाती है ।

12th class economic notes in hindi 1st book chapter-4 Government Budget and the Economy

12th class economic notes in hindi 1st book chapter-4  Government Budget and the Economy अध्याय - 4 सरकारी बजट एवं अर्थव्यवस्था


CBSE Revision Notes for CBSE Class 12 Economics Government Budget and the Economy Government budget - meaning, objectives and components. Classification of receipts - revenue receipts and capital receipts; classification of expenditure –revenue expenditure and capital expenditure. Measures of government deficit - revenue deficit, fiscal deficit, primary deficit their meaning.


12th class economic Chapter - 4 Government Budget and the Economy notes in Hindi medium


12th class economic Chapter - 4 Government Budget and the Economy notes in Hindi medium

📚 अध्याय - 4 📚
📑 सरकारी बजट एवं अर्थव्यवस्था 📑

🔹 बजट :-

यह आगामी वित्तीय वर्ष के लिए सरकार की अनुमानित व्ययों एवं अनुमानित प्राप्तियों का वार्षिक वित्तीय विवरण है ।

🔹 बजट के मुख्य उद्देश्य:-

( i ) संसाधनों का पुनः आवंटन 
( ii ) आय व धन का पुनः वितरण 
( iii ) आर्थिक स्थिरता 
( iv ) सार्वजनिक उद्यमों का प्रबन्ध
( v ) आर्थिक विकास 
( vi ) निर्धनता एवं बेरोजगारी उन्मूलन 

🔹  बजट के घटक:-  

( a ) राजस्व बजट 
( b ) पूँजीगत बजट 

राजस्व बजट सरकार की राजस्व प्राप्तियों तथा व्ययों का विवरण है । 9 

🔹 बजट को दो भागों में बाँटा जाता है :-

✴️ 1 . बजट प्राप्तियाँ : इससे तात्पर्य एक वित्तीय वर्ष की अवधि में सरकार की सभी स्रोतों से अनुमानित मौद्रिक प्राप्तियों से है । बजट प्राप्तियों को निम्न दो उप - वर्गों में बाँटा जा सकता है - राजस्व प्राप्तियाँ तथा पूँजीगत प्राप्तियाँ ।

12th class economic Chapter - 4 Government Budget and the Economy notes in Hindi medium

🔹 प्रत्यक्ष कर :-

प्रत्यक्ष कर वह कर है जो उसी व्यक्ति द्वारा दिया जाता है जिस पर वह कानूनी रूप में लगाया जाता है । इस कर का भार अन्य व्यक्तियों पर नहीं टाला जा सकता है । 

उदाहरण - आय कर , सम्पत्ति कर । 

🔹 अप्रत्यक्ष कर :-

अप्रत्यक्ष कर वे कर हैं जो लगाए तो किसी एक व्यक्ति पर । जाते हैं किंतु इनका आंशिक या पूर्ण रूप से भुगतान किसी अन्य व्यक्ति को करना पड़ता है । इस कर का भार अन्य व्यक्तियों पर टाला जा सकता है ।

 उदाहरण - बिक्री कर , मूल्य वृद्धि कर ( VAT ) , GST - 

🔹 राजस्व प्राप्तियाँ :-

1 . ये सरकार की परिसम्पत्तियों को कम नहीं करती हैं । 
2 . ये सरकार के दायित्वों में वृद्धि नहीं करती है । 
3 . ये आवर्ती प्रकृति की होती है । 

🔹 पुँजीगत प्राप्तियाँ :- 

( i ) ये सरकार की परिसम्पत्तियों को कम कर देती है । 
( ii ) ये सरकार के दायित्वों में वृद्धि करती है । 
( iii ) ये आवर्ती प्रकृति की नहीं होती ।

2 . बजट व्यय :-

इससे तात्पर्य एक वित्तीय वर्ष की अवधि में सरकार द्वारा विभिन्न मदों के ऊपर की जाने वाली आनुमानित व्यय से है । बजट व्यय को निम्न दो मुख्य उप वर्गों में बाँटा जाता है , राजस्व व्यय तथा पूँजीगत व्यय ।

12th class economic Chapter - 4 Government Budget and the Economy notes in Hindi medium

🔹 राजस्व व्यय :- 

( i ) ये सरकार की परिसम्पत्तियों में वृद्धि नहीं करते हैं । 
( ii ) ये सरकार के दायित्वों में कोई कमी नहीं करते हैं । जैसे - ब्याज का भुगतान , आर्थिक सहायता , कानून व्यवस्था बनाये रखने पर व्यय आदि । 
( iii ) ये आवर्ती प्रकृति के होते हैं । 

🔹 पूँजीगत व्यय:- 

( i ) ये सरकार की परिसम्पत्तियों में वृद्धि करते हैं । 
( ii ) सरकार के दायित्वों में कमी करते हैं । जैसे विद्यालय भवनों का निर्माण , पुराने ऋण का भुगतान , वित्तीय परिसम्पत्तियों का क्रय इत्यादि । 
( iii ) ये आवर्ती प्रकृति के नहीं होते ।

🔹 राजस्व घाटा :- 

जब सरकार के कुल राजस्व व्यय उसकी कुल राजस्व प्राप्तियों से अधिक हो । 

🔹 राजस्व घाटे के प्रभाव :- 

( i ) यह सरकार की भावी देनदारियों में वृद्धि करता है । 
( ii ) यह सरकार के अनावश्यक व्ययों की जानकारी देता है । 
( iii ) यह ऋणों के बोझ को बढ़ाता है ।

🔹 राजकोषीय घाटा :- 

कुल व्यय की उधार रहित कुल प्राप्तियों पर अधिकता । 

🔹 राजकोषीय घाटा :- 

कुल व्यय - उधार के बिना कुल बजट प्राप्तियाँ - 

🔹 राजकोषीय घाटे के प्रभाव :-

( i ) यह मुद्रा स्फीति को बढ़ाता है ।
( ii ) देश ऋण - जाल में फंस जाता है । 
( ii ) यह देश के भावी विकास तथा प्रगति को कम करता है । 

🔹 प्राथमिक घाटा :- 

राजकोषीय घाटे में से ब्याज अदायगियों को घटाने से प्राथमिक घाटे का पता चलता है । 

🔹 प्राथमिक घाटा :- राजकोषीय घाटा - ब्याज अदायगियाँ 

🔹 प्राथमिक घाटे के प्रभाव :-

1 . इससे पता चलता है कि भूतपूर्व नीतियों का भावी पीढ़ी पर क्या भार पड़ेगा । 
2 . शून्य या प्राथमिक घाटे से अभिप्राय है कि सरकार पुराने ऋणों का ब्याज चुकाने के लिए उधार लेने को मजबूर है । 
3 . यह ब्याज अदायगियों रहित राजकोषीय घाटे को पूरा करने के लिए सरकार की उधार जरूरतों को दर्शाता है ।

12th class economic notes in hindi 1st book chapter-3 Determination of Income and Employment

12th class economic notes in hindi 1st book chapter-3  Determination of Income and Employment




CBSE Revision Notes for CBSE Class 12 Economics Determination of Income and Employment Ex Ante and Ex Post: Movement Along a Curve Versus Shift of a Curve, The Short Run Fixed Price Analysis of the Product Market- A Point on the Aggregate Demand Curve, Effects of an Autonomous Change on Equilibrium Demand in the Product Market, The Multiplier Mechanism

12th class economic chapter 3 Determination of Income and Employment notes in Hindi medium


12th class economic notes in hindi 1st book chapter-3  Determination of Income and Employment


📚 अध्याय - 3 📚
🔥 आय और रोजगार का निर्धारण 🔥

🔹 समग्र माँग :-

एक अर्थव्यवस्था के समस्त क्षेत्रों द्वारा एक दिए हुए आय स्तर पर एवं एक निश्चित समयावधि में समस्त अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के नियोजित क्रय के कुल मूल्य को समग्र मांग कहते हैं । एक अर्थव्यवस्था में वस्तुओं व सेवाओं की कुल मांग को समग्र मांग ( AD ) कहते हैं इसे कुल व्यय के रूप में मापा जाता है । 

🔹 समग्र मांग के मुख्य घटक निम्नलिखित हैं :- 

( i ) उपभोग व्यय ( c ) . 
( ii ) निवेश व्यय ( I ) 
( ii ) सरकारी व्यय ( G ) . 
( iv ) शुद्ध निर्यात ( X - M ) . 
इस प्रकार , AD = C + I + G + ( X - M ) 
दो क्षेत्र वाली अर्थव्यवस्था में AD = C + I .

🔹 समग्र पूर्तिः-

एक अर्थव्यवस्था की सभी उत्पादक इकाईयों द्वारा एक निश्चित समयावधि में सभी अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के नियोजित उत्पादन के कुल मूल्य को समग्र पूर्ति कहते हैं । समग्र पूर्ति के मौद्रिक मूल्य को ही राष्ट्रीय आय कहते हैं । अर्थात् राष्ट्रीय आय सदैव समग्र पूर्ति के समान होती है । 

AD = C + S 

समग्र पूर्ति देश के राष्ट्रीय आय को प्रदर्शित करती है । 

AS = Y ( राष्ट्रीय आय )

🔹 उपभोग फलनः- 

उपभोग फलन आय ( Y ) और उपभोग ( C ) के बीच फलनात्मक सम्बन्ध को दर्शाता है ।

 c = f ( Y ) 

यहाँ  C = उपभोग 
       Y = आय 
       f = फलनात्मक सम्बन्ध 

🔹 उपभोग फलन की समीकरण :-
        _
 C = C + MPC . Y . 

🔹 स्वायत्त उपभोग ( C ) :-

आय के शून्य स्तर पर जो उपभोग होता है उसे स्वायत्त उपभोग कहते हैं । जो आय में परिवर्तन होने पर भी परिवर्तित नहीं होता है , अर्थात् यह आय बेलोचदार होता है ।

🔹 प्रत्याशित उपभोग :-

 राष्ट्रीय आय के मिश्रित स्तर पर नियोजित निवेश को कहते है ।

🔹 प्रेरित उपभोग :- 

उस उपभोग स्तर से है जो प्रत्यक्ष रूप से आय पर निर्भर करता है । 0 

🔹 उपभोग प्रवृति :- 

उपभोग प्रवृत्ति दो प्रकार की होती है
( 1 ) औसत उपभोग प्रवृत्ति ( APC ) 
( 2 ) सीमांत उपभोग प्रवृत्ति ( MPC ) 

🔹औसत उपभोग प्रवृत्ति ( APC ) :-

औसत प्रवृत्ति को कुल उपभोग तथा कुल आय के बीच अनुपात के रूप में परिभाषित किया जाता है । 

APC = कुल उपभोग ( C ) / कुल आय ( Y ) 

🔹APC के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण बिन्दु :-

( i ) APC इकाई से अधिक रहता है जब तक उपभोग राष्ट्रीय आय से अधिक होता है । समविच्छेद बिन्दु से पहले , APC > 1 . 

( ii ) APC = 1 समविच्छेद बिन्दु पर यह इकाई के बराबर होता है जब उपभोग और आय बराबर होता है । C = Y 

( iii ) आय बढ़ने के कारण APC लगातार घटती है । 

( iv ) APC कभी भी शून्य नहीं हो सकती , क्योंकि आय के शून्य स्तर पर भी स्वायत्त उपभोग होता है । 

🔹 सीमांत उपभोग प्रवृत्ति ( MPC ) :-

उपभोग में परिवर्तन तथा आय में परिवर्तन के अनुपात को , सीमांत उपभोग प्रवृत्ति कहते हैं । 

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 MPC का मान शून्य तथा एक के बीच में रहता है । लेकिन यदि सम्पूर्ण अतिरिक्त आय उपभोग हो जाती है तब ∆C = ∆Y , अत : MPC = 1 . इसी प्रकार यदि सम्पूर्ण अतिरिक्त आय की बचत कर ली जाती है तो ∆C = 0 . अत : MPC = 0 . 

🔹 बचत फलन :- 

बचत और आय के फलनात्मक सम्बन्ध को दर्शाता है । 

s = f ( Y ) 
यहाँ s = बचत 
Y = आय 
f = फलनात्मक सम्बन्ध . 

🔹 बचत फलन का समीकरण :-

s = - S . + sY . 
जहाँ s = MPS 

🔹 बचत प्रवृत्ति दो प्रकार की होती है : - 

APS तथा MPS 

🔹औसत बचत प्रवृत्ति ( APS ) :-

कुल बचत तथा कुल आय के बीच अनुपात को APS कहते हैं ।

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🔹 औसत बचत प्रवृत्ति APS की विशेषताएँ :-

1 . APS कभी भी इकाई या इकाई से अधिक नहीं हो सकती क्योंकि कभी भी बचत आय के बराबर तथा आय से अधिक नहीं हो सकती । 
2 . APS शून्य हो सकती है : समविच्छेद बिन्दु पर जब C = Y है तब S = 0 . 
3 . APS ऋणात्मक या इकाई से कम हो सकता है । समविच्छेद बिन्दु से नीचे स्तर पर APS ऋणात्मक होती है । क्योंकि अर्थव्यवस्था में अबचत ( Dissavings ) होती है तथा C > Y . 
4 . APS आय के बढ़ने के साथ बढ़ती हैं 

🔹 सीमांत बचत प्रवृत्ति ( MPS ) :- 

आय में परिवर्तन के फलस्वरूप बचत में परिवर्तन के अनुपात को सीमांत बचत प्रवृत्ति कहते हैं ।

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✴️ MPS का मान शून्य तथा इकाई ( एक ) के बीच में रहता है । लेकिन यदि 

( i ) यदि सम्पूर्ण अतिरिक्त आय की बचत की ली जाती है , तब AS = AY , अत : MPS = 1 . 

( ii ) यदि सम्पूर्ण अतिरिक्त आय , उपभोग कर ली जाती है , तब AS = 0 , अतः MPS = 0 . 

🔹 औसत उपभोग प्रवृत्ति ( APC ) तथा औसत प्रवृत्ति ( APS ) में सम्बन्ध :-

सदैव APC + APS = 1 यह सदैव ऐसा ही होता है , क्योंकि आय को या तो उपभोग किया जाता है या फिर आय की बचत की जाती है । 

प्रमाणः Y = C + S

दोनों पक्षों का Y से भाग देने पर 

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1 = APC + APS 

अथवा APC = 1 - APS या APS = 1 - APC | इस प्रकार APC तथा APS का योग हमेशा इकाई के बराबर होता है । 

🔹 सीमांत उपभोग प्रवृत्ति ( MPC ) तथा सीमांत बचत प्रवृत्ति ( MPS ) में सम्बन्ध:- 

सदैव MPC + MPS = 1 ; MPC हमेशा सकारात्मक होती है तथा 1 से कम होती है । इसलिए MPS भी सकारात्मक तथा 1 से कम होनी चाहिए । प्रमाण ∆Y = ∆C + ∆S . 

दोनों पक्षों को AY से भाग करने पर 

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1 = MPC + MPS अथवा 

MPC = 1 - MPS अथवा

MPC = 1 - MPC 

✴️ एक अर्थव्यवस्था में एक वित्तीय वर्ष में पूँजीगत वस्तुओं के स्टॉक में वृद्धि को पूँजी निर्माण / निवेश कहते हैं । 

( i ) प्रेरित निवेश 
( ii ) स्वतंत्र निवेश

🔹  प्रेरित निवेश :-

प्रेरित निवेश वह निवेश है जो लाभ कमाने की भावना से प्रेरित होकर किया जाता है । प्रेरित निवेश का आय से सीधा सम्बन्ध होता है ।

🔹 स्वतंत्र ( स्वायत्त ) निवेश :- 

स्वायत्त निवेश वह निवेश है जो आय के स्तर में परिवर्तन से प्रभावित नहीं होता अर्थात् आय निरपेक्ष होता है । 

🔹 नियोजित बचत :- 

एक अर्थव्यवस्था के सभी गृहस्थ ( बचतकर्ता ) एक निश्चित समय अवधि में आय के विभिन्न स्तरों पर जितनी बचत करने की योजना बनाते हैं , नियोजित बचत कहलाती है । 

🔹 नियोजित निवेश :- 

एक अर्थव्यवस्था के सभी निवेशकर्ता आय के विभिन्न स्तरों पर जितना निवेश करने की योजना बनाते हैं , नियोजित निवेश कहलाती है ।

🔹 वास्तविक बचत :-

अर्थव्यवस्था में दी गई अवधि के अंत में आय में से उपभोग व्यय घटाने के बाद , जो कुछ वास्तव में शेष बचता है , उसे वास्तविक बचत कहते हैं । 


🔹 वास्तविक निवेश :-

किसी अर्थव्यवस्था में एक वित्तीय वर्ष में किए गए कुल निवेश को वास्तविक निवेश कहा जाता है । इसका आंकलन अवधि के समाप्ति वास्तविक पर किया जाती है । 

🔹 आय का संतुलन स्तर :-

आय का वह स्तर है जहाँ समग्र माँग , उत्पादन के स्तर ( समग्र पूर्ति ) के बराबर होती है अत : AD = AS या s = I . 

🔹 पूर्ण रोजगार :-

इससे अभिप्राय अर्थव्यवस्था की ऐसी स्थिति से है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति जो योग्य है तथा प्रचलित मौद्रिक मजदूरी की दर पर काम करने को तैयार है , को रोजगार मिल जाता है ।

🔹 ऐच्छिक बेरोजगारी :-

ऐच्छिक बेरोजगारी से अभिप्रायः उस स्थिति से है , जिसमें बाजार में प्रचलित मजदूरी दर पर कार्य उपलब्ध होने के बावजूद योग्य व्यक्ति कार्य करने को तैयार नहीं है । 

🔹 अनैच्छिक बेरोजगारी :-

अर्थव्यवस्था की ऐसी स्थिति है जहाँ कार्य करने के इच्छुक व योग्य व्यक्ति प्रचलित मजदूरी दर पर कार्य करने के लिए इच्छुक है लेकिन उन्हें कार्य नहीं मिलता । 

🔹 निवेश गुणक :- 

निवेश में परिवर्तन के फलस्वरूप आय में परिवर्तन के अनुपात को निवेश गुणक कहते हैं ।

12th class economic chapter 3 Determination of Income and Employment notes in Hindi medium

🔹 जब समग्र मांग ( AD ) , पूर्ण रोजगार स्तर पर समग्र पूर्ति ( AS ) से अधिक हो जाए तो उसे अत्यधिक मांग कहते हैं । 

🔹 जब समग्र मांग ( AD ) , पूर्ण रोजगार स्तर पर समग्र पूर्ति ( AS ) से कम होती है , उसे अभावी मांग कहते हैं । 

🔹 स्फीतिक अंतराल , वास्तविक समग्र मांग और पूर्ण रोजगार संतुलन को बनाए रखने के लिए आवश्यक समग्र मांग के बीच का अंतर होता है । यह समग्र मांग के आधिक्य का माप है । यह अर्थव्यवस्था में स्फीतिकारी प्रभाव उत्पन्न करता है । 

🔹 अवस्फीति अंतराल , वास्तविक समग्र मांग और पूर्ण रोजगार संतुलन को बनाए रखने के आवश्यक समग्र मांग के बीच का अंतर होता है । यह समग्र मांग में कमी का माप है । यह अर्थव्यवस्था अवस्फीति ( मंदी ) उत्पन्न करता है ।

12th class economic chapter 3 Determination of Income and Employment notes in Hindi medium

12th class economic chapter 3 Determination of Income and Employment notes in Hindi medium