12th class economic notes in hindi 1st book chapter-3 Determination of Income and Employment

12th class economic notes in hindi 1st book chapter-3  Determination of Income and Employment




CBSE Revision Notes for CBSE Class 12 Economics Determination of Income and Employment Ex Ante and Ex Post: Movement Along a Curve Versus Shift of a Curve, The Short Run Fixed Price Analysis of the Product Market- A Point on the Aggregate Demand Curve, Effects of an Autonomous Change on Equilibrium Demand in the Product Market, The Multiplier Mechanism

12th class economic chapter 3 Determination of Income and Employment notes in Hindi medium


12th class economic notes in hindi 1st book chapter-3  Determination of Income and Employment


📚 अध्याय - 3 📚
🔥 आय और रोजगार का निर्धारण 🔥

🔹 समग्र माँग :-

एक अर्थव्यवस्था के समस्त क्षेत्रों द्वारा एक दिए हुए आय स्तर पर एवं एक निश्चित समयावधि में समस्त अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के नियोजित क्रय के कुल मूल्य को समग्र मांग कहते हैं । एक अर्थव्यवस्था में वस्तुओं व सेवाओं की कुल मांग को समग्र मांग ( AD ) कहते हैं इसे कुल व्यय के रूप में मापा जाता है । 

🔹 समग्र मांग के मुख्य घटक निम्नलिखित हैं :- 

( i ) उपभोग व्यय ( c ) . 
( ii ) निवेश व्यय ( I ) 
( ii ) सरकारी व्यय ( G ) . 
( iv ) शुद्ध निर्यात ( X - M ) . 
इस प्रकार , AD = C + I + G + ( X - M ) 
दो क्षेत्र वाली अर्थव्यवस्था में AD = C + I .

🔹 समग्र पूर्तिः-

एक अर्थव्यवस्था की सभी उत्पादक इकाईयों द्वारा एक निश्चित समयावधि में सभी अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के नियोजित उत्पादन के कुल मूल्य को समग्र पूर्ति कहते हैं । समग्र पूर्ति के मौद्रिक मूल्य को ही राष्ट्रीय आय कहते हैं । अर्थात् राष्ट्रीय आय सदैव समग्र पूर्ति के समान होती है । 

AD = C + S 

समग्र पूर्ति देश के राष्ट्रीय आय को प्रदर्शित करती है । 

AS = Y ( राष्ट्रीय आय )

🔹 उपभोग फलनः- 

उपभोग फलन आय ( Y ) और उपभोग ( C ) के बीच फलनात्मक सम्बन्ध को दर्शाता है ।

 c = f ( Y ) 

यहाँ  C = उपभोग 
       Y = आय 
       f = फलनात्मक सम्बन्ध 

🔹 उपभोग फलन की समीकरण :-
        _
 C = C + MPC . Y . 

🔹 स्वायत्त उपभोग ( C ) :-

आय के शून्य स्तर पर जो उपभोग होता है उसे स्वायत्त उपभोग कहते हैं । जो आय में परिवर्तन होने पर भी परिवर्तित नहीं होता है , अर्थात् यह आय बेलोचदार होता है ।

🔹 प्रत्याशित उपभोग :-

 राष्ट्रीय आय के मिश्रित स्तर पर नियोजित निवेश को कहते है ।

🔹 प्रेरित उपभोग :- 

उस उपभोग स्तर से है जो प्रत्यक्ष रूप से आय पर निर्भर करता है । 0 

🔹 उपभोग प्रवृति :- 

उपभोग प्रवृत्ति दो प्रकार की होती है
( 1 ) औसत उपभोग प्रवृत्ति ( APC ) 
( 2 ) सीमांत उपभोग प्रवृत्ति ( MPC ) 

🔹औसत उपभोग प्रवृत्ति ( APC ) :-

औसत प्रवृत्ति को कुल उपभोग तथा कुल आय के बीच अनुपात के रूप में परिभाषित किया जाता है । 

APC = कुल उपभोग ( C ) / कुल आय ( Y ) 

🔹APC के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण बिन्दु :-

( i ) APC इकाई से अधिक रहता है जब तक उपभोग राष्ट्रीय आय से अधिक होता है । समविच्छेद बिन्दु से पहले , APC > 1 . 

( ii ) APC = 1 समविच्छेद बिन्दु पर यह इकाई के बराबर होता है जब उपभोग और आय बराबर होता है । C = Y 

( iii ) आय बढ़ने के कारण APC लगातार घटती है । 

( iv ) APC कभी भी शून्य नहीं हो सकती , क्योंकि आय के शून्य स्तर पर भी स्वायत्त उपभोग होता है । 

🔹 सीमांत उपभोग प्रवृत्ति ( MPC ) :-

उपभोग में परिवर्तन तथा आय में परिवर्तन के अनुपात को , सीमांत उपभोग प्रवृत्ति कहते हैं । 

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 MPC का मान शून्य तथा एक के बीच में रहता है । लेकिन यदि सम्पूर्ण अतिरिक्त आय उपभोग हो जाती है तब ∆C = ∆Y , अत : MPC = 1 . इसी प्रकार यदि सम्पूर्ण अतिरिक्त आय की बचत कर ली जाती है तो ∆C = 0 . अत : MPC = 0 . 

🔹 बचत फलन :- 

बचत और आय के फलनात्मक सम्बन्ध को दर्शाता है । 

s = f ( Y ) 
यहाँ s = बचत 
Y = आय 
f = फलनात्मक सम्बन्ध . 

🔹 बचत फलन का समीकरण :-

s = - S . + sY . 
जहाँ s = MPS 

🔹 बचत प्रवृत्ति दो प्रकार की होती है : - 

APS तथा MPS 

🔹औसत बचत प्रवृत्ति ( APS ) :-

कुल बचत तथा कुल आय के बीच अनुपात को APS कहते हैं ।

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🔹 औसत बचत प्रवृत्ति APS की विशेषताएँ :-

1 . APS कभी भी इकाई या इकाई से अधिक नहीं हो सकती क्योंकि कभी भी बचत आय के बराबर तथा आय से अधिक नहीं हो सकती । 
2 . APS शून्य हो सकती है : समविच्छेद बिन्दु पर जब C = Y है तब S = 0 . 
3 . APS ऋणात्मक या इकाई से कम हो सकता है । समविच्छेद बिन्दु से नीचे स्तर पर APS ऋणात्मक होती है । क्योंकि अर्थव्यवस्था में अबचत ( Dissavings ) होती है तथा C > Y . 
4 . APS आय के बढ़ने के साथ बढ़ती हैं 

🔹 सीमांत बचत प्रवृत्ति ( MPS ) :- 

आय में परिवर्तन के फलस्वरूप बचत में परिवर्तन के अनुपात को सीमांत बचत प्रवृत्ति कहते हैं ।

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✴️ MPS का मान शून्य तथा इकाई ( एक ) के बीच में रहता है । लेकिन यदि 

( i ) यदि सम्पूर्ण अतिरिक्त आय की बचत की ली जाती है , तब AS = AY , अत : MPS = 1 . 

( ii ) यदि सम्पूर्ण अतिरिक्त आय , उपभोग कर ली जाती है , तब AS = 0 , अतः MPS = 0 . 

🔹 औसत उपभोग प्रवृत्ति ( APC ) तथा औसत प्रवृत्ति ( APS ) में सम्बन्ध :-

सदैव APC + APS = 1 यह सदैव ऐसा ही होता है , क्योंकि आय को या तो उपभोग किया जाता है या फिर आय की बचत की जाती है । 

प्रमाणः Y = C + S

दोनों पक्षों का Y से भाग देने पर 

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1 = APC + APS 

अथवा APC = 1 - APS या APS = 1 - APC | इस प्रकार APC तथा APS का योग हमेशा इकाई के बराबर होता है । 

🔹 सीमांत उपभोग प्रवृत्ति ( MPC ) तथा सीमांत बचत प्रवृत्ति ( MPS ) में सम्बन्ध:- 

सदैव MPC + MPS = 1 ; MPC हमेशा सकारात्मक होती है तथा 1 से कम होती है । इसलिए MPS भी सकारात्मक तथा 1 से कम होनी चाहिए । प्रमाण ∆Y = ∆C + ∆S . 

दोनों पक्षों को AY से भाग करने पर 

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1 = MPC + MPS अथवा 

MPC = 1 - MPS अथवा

MPC = 1 - MPC 

✴️ एक अर्थव्यवस्था में एक वित्तीय वर्ष में पूँजीगत वस्तुओं के स्टॉक में वृद्धि को पूँजी निर्माण / निवेश कहते हैं । 

( i ) प्रेरित निवेश 
( ii ) स्वतंत्र निवेश

🔹  प्रेरित निवेश :-

प्रेरित निवेश वह निवेश है जो लाभ कमाने की भावना से प्रेरित होकर किया जाता है । प्रेरित निवेश का आय से सीधा सम्बन्ध होता है ।

🔹 स्वतंत्र ( स्वायत्त ) निवेश :- 

स्वायत्त निवेश वह निवेश है जो आय के स्तर में परिवर्तन से प्रभावित नहीं होता अर्थात् आय निरपेक्ष होता है । 

🔹 नियोजित बचत :- 

एक अर्थव्यवस्था के सभी गृहस्थ ( बचतकर्ता ) एक निश्चित समय अवधि में आय के विभिन्न स्तरों पर जितनी बचत करने की योजना बनाते हैं , नियोजित बचत कहलाती है । 

🔹 नियोजित निवेश :- 

एक अर्थव्यवस्था के सभी निवेशकर्ता आय के विभिन्न स्तरों पर जितना निवेश करने की योजना बनाते हैं , नियोजित निवेश कहलाती है ।

🔹 वास्तविक बचत :-

अर्थव्यवस्था में दी गई अवधि के अंत में आय में से उपभोग व्यय घटाने के बाद , जो कुछ वास्तव में शेष बचता है , उसे वास्तविक बचत कहते हैं । 


🔹 वास्तविक निवेश :-

किसी अर्थव्यवस्था में एक वित्तीय वर्ष में किए गए कुल निवेश को वास्तविक निवेश कहा जाता है । इसका आंकलन अवधि के समाप्ति वास्तविक पर किया जाती है । 

🔹 आय का संतुलन स्तर :-

आय का वह स्तर है जहाँ समग्र माँग , उत्पादन के स्तर ( समग्र पूर्ति ) के बराबर होती है अत : AD = AS या s = I . 

🔹 पूर्ण रोजगार :-

इससे अभिप्राय अर्थव्यवस्था की ऐसी स्थिति से है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति जो योग्य है तथा प्रचलित मौद्रिक मजदूरी की दर पर काम करने को तैयार है , को रोजगार मिल जाता है ।

🔹 ऐच्छिक बेरोजगारी :-

ऐच्छिक बेरोजगारी से अभिप्रायः उस स्थिति से है , जिसमें बाजार में प्रचलित मजदूरी दर पर कार्य उपलब्ध होने के बावजूद योग्य व्यक्ति कार्य करने को तैयार नहीं है । 

🔹 अनैच्छिक बेरोजगारी :-

अर्थव्यवस्था की ऐसी स्थिति है जहाँ कार्य करने के इच्छुक व योग्य व्यक्ति प्रचलित मजदूरी दर पर कार्य करने के लिए इच्छुक है लेकिन उन्हें कार्य नहीं मिलता । 

🔹 निवेश गुणक :- 

निवेश में परिवर्तन के फलस्वरूप आय में परिवर्तन के अनुपात को निवेश गुणक कहते हैं ।

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🔹 जब समग्र मांग ( AD ) , पूर्ण रोजगार स्तर पर समग्र पूर्ति ( AS ) से अधिक हो जाए तो उसे अत्यधिक मांग कहते हैं । 

🔹 जब समग्र मांग ( AD ) , पूर्ण रोजगार स्तर पर समग्र पूर्ति ( AS ) से कम होती है , उसे अभावी मांग कहते हैं । 

🔹 स्फीतिक अंतराल , वास्तविक समग्र मांग और पूर्ण रोजगार संतुलन को बनाए रखने के लिए आवश्यक समग्र मांग के बीच का अंतर होता है । यह समग्र मांग के आधिक्य का माप है । यह अर्थव्यवस्था में स्फीतिकारी प्रभाव उत्पन्न करता है । 

🔹 अवस्फीति अंतराल , वास्तविक समग्र मांग और पूर्ण रोजगार संतुलन को बनाए रखने के आवश्यक समग्र मांग के बीच का अंतर होता है । यह समग्र मांग में कमी का माप है । यह अर्थव्यवस्था अवस्फीति ( मंदी ) उत्पन्न करता है ।

12th class economic chapter 3 Determination of Income and Employment notes in Hindi medium

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12th class economic notes in hindi 1st book chapter-2 Money and Banking

12th class economic notes in hindi 1st book chapter-2  Money and Banking


CBSE Revision Notes for CBSE Class 12 Economics Money and Banking Money - its meaning and functions. Supply of money - Currency held by the public and net demand deposits held by commercial banks. Money creation by the commercial banking system. Central bank and its functions (example of the Reserve Bank of India): Bank of issue, Govt. Bank, Banker's Bank, Controller of Credit through Bank Rate, CRR, SLR, Repo Rate and Reverse Repo Rate, Open Market Operations, Margin requirement.

12th class economic chapter 2 Money and Banking notes in Hindi medium


12th class economic notes in hindi 1st book chapter-2  Money and Banking

📚 अध्याय - 2  📚
🔥 मुद्रा एवं बैंकिंग 🔥

🔹 मुद्रा :-

मुद्रा को ऐसी वस्तु के रूप में परिभाषित किया जा सकता है , जो विनिमय के माध्यम , मूल्य के मापक , स्थगित भुगतानों के माप तथा मूल्य संचय हेतु , संचय रूप से स्वीकार की जाती है । 

🔹 मुद्रा की आपूर्ति = जनता के पास करेंसी + बैंकों के पास मांग जमाएं + रिजर्व बैंक के पास अन्य जमाएं

 Ms = C + DD + OD

🔹 मांग जमा :-

ये वे जमाएं हैं जो किसी भी समय मांगने पर बैंक से निकलवाई जा सकती हैं या जिन्हें चैक द्वारा भी निकलवाया जा सकता है । 

🔹 व्यावसायिक बैंक का अर्थ :-

व्यावसायिक बैंक वह वित्तीय संस्था है जो मुद्रा तथा साख में व्यापार करती है । व्यावसायिक बैंक ऋण प्रदान करने के उद्देश्य से जनता से जमाएँ स्वीकार करते हैं तथा अपने लिए लाभ का सृजन करती हैं ।

🔹 व्यावसायिक बैंकों द्वारा साख निर्माण / मुद्रा निर्माण 

साख निर्माण से तात्पर्य बैंकों की उस शक्ति से है जिसके द्वारा वे प्राथमिक जमाओं का विस्तार करते हैं । बैंकों द्वारा साख सृजन की प्रक्रिया तथा वैधानिक आरक्षित अनुपात ( LRR ) में विपरीत सम्बन्ध होता है ।

 जमा सृजन = प्रारम्भिक जमा x जमा गुणक ।

 शुद्ध / निवल साख का सृजन = जमा सृजन - प्रारम्भिक जमा । 

🔹 केन्द्रीय बैंक :-

एक देश की बैंकिंग व वित्तीय प्रणाली में सर्वोच्च संस्था है ।
जो देश के मौद्रिक व बैंकिंग ढाँचे का संचालन , नियंत्रण , निर्देशन एवं नियमन करती है तथा देश के हित में मौद्रिक नीति का निर्माण करती है । 

🔹 केन्द्रीय बैंक के कार्य :- 

1 . नोट निर्गमन का एकाधिकार अर्थात् वैधानिक मुद्रा का जारीकर्ता बैंक 
2 . सरकार का बैंकर , अभिकर्ता एवं सलाहकार 
3 . बैंकों का बैंक तथा पर्यवेक्षक 
4 . साख नियंत्रक 
5 . विदेशी मुद्रा का एक मात्र संग्राहक और संरक्षक

🔹 रेपो दर :-

वह ब्याज दर जिस पर केन्द्रीय बैंक वैधानिक तरलता अनुपात की प्रतिभूतियों के अतिरिक्त शेष प्रतिभूति पर पुनक्रय प्रस्ताव के बदले व्यायवसायिक बैंकों को अल्पकाल के लिए ऋण प्रदान करता है , रेपो दर कहलाता है । 

🔹 रिवर्स रेपो दर :-

वह दर जिस पर व्यवसायिक बैंक केन्द्रीय बैंक के पास अपना अतिरिक्त फंड जमा करके केन्द्रीय बैंक से सरकारी प्रतिभूति के पुनर्विक्रय प्रस्ताव के तहत प्रतिभूति क्रय करते है । 

🔹 वैधानिक तरलता अनुपात ( SLR ) :- 

SLR से अभिप्राय वाणिज्यिक बैंकों की तरल परिसंपतियों से है जो उन्हें अपनी कुल जमाओं के न्यूनतम प्रतिशत के रूप में अपने पास रखने की आवश्यकता होती है ।

🔹 नकद आरक्षित अनुपात ( CRR ) :-

प्रत्येक व्यापारिक बैंक को अपने पास कुल जमा राशियों का एक न्यूनतम अनुपात केन्द्रीय बैंक के पास कानूनन जमा करना होता है । इसे नकद आरक्षित अनुपात कहते हैं । 

🔹 खुले बाजार की क्रियाएँ ( Open Market Operations ) :- 

देश के केंद्रीय बैंक ( रिजर्व बैंक ) द्वारा खुले बाजार में प्रतिभूतियों ( Securities ) के खरीदने अथवा बेचने से संबधित क्रिया को खुले बाजार की क्रिया कहते हैं । जब रिजर्व बैंक ( केंद्रीय बैंक ) बाजार में प्रतिभूतियों को बेचना प्रारंभ करता है तो वाणिज्य बैंकों के नकदी कोषों में कमी आ जाती है , इसके परिणामस्वरूप बैंकों की साख निर्माण क्षमता घट जाती है । इस प्रकार , प्रतिभूतियों की बिक्री साख की उपलब्धता को कम कर देती है ।

🔹 बैंक दर ( Bank Rate ) :- 

जिस दर पर देश का केंद्रीय बैंक वाणिज्यिक बैंकों को ऋण देता है उसे बैंक दर कहते है ।

12th class economic notes in hindi 1st book Introductory Macroeconomics chapter-1 National Income and Related Aggregates

12th class economic notes in hindi 1st book Introductory Macroeconomics chapter-1  National Income and Related Aggregates


CBSE Revision Notes for CBSE Class 12 Economics National Income and Related Aggregates Some basic concepts: consumption goods, capital goods, final goods, intermediate goods; stocks and flows; gross investment and depreciation. Circular flow of income; Methods of calculating National Income - Value Added or Product method, Expenditure method, Income method


12th class economic chapter 1 National Income And Related notes in Hindi medium
12th class economic chapter 1 National Income And Related notes in Hindi medium


          अध्याय - 1 
राष्ट्रीय आय एवं सम्बद्ध समाहार

🔹 उपभोक्ता वस्तुएँ :- 

वे अंतिम वस्तुएँ और सेवायें जो प्रत्यक्ष रूप से उपभोक्ता की मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं । उपभोक्ता द्वारा क्रय की गई वस्तुएँ और सेवाएँ उपभोक्ता वस्तुएँ हैं । 

🔹 पूँजीगत वस्तुएँ :-

ये ऐसी अंतिम वस्तुएँ हैं जो उत्पादन में सहायक होती हैं तथा आय सृजन के लिए प्रयोग की जाती हैं । ये उत्पादक की पूँजीगत परिसंपत्ति में वृद्धि करती हैं ।

🔹 अंतिम वस्तुएँ :-

वे वस्तुएँ जो उपभोग व निवेश के लिए उपलब्ध होती हैं ये पुनर्विक्रय या मूल्यवर्द्धन के लिए नहीं होती । उपभोक्ता द्वारा उपयोग की गई सभी वस्तुएँ व सेवाएँ अंतिम वस्तुएँ होती हैं ।

🔹 मध्यवर्ती वस्तुएँ :-

ये ऐसी वस्तुएँ और सेवायें हैं , जिनकी एक ही वर्ष में पुनः बिक्री की जा सकती हैं या अंतिम वस्तुओं के उत्पादन में कच्चे माल के रूप में प्रयोग की जाती हैं या जिनका रूपांतरण संभव है । ये प्रत्यक्ष रूप से मानव आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं करती । उत्पादक द्वारा प्रयोग की गई सेवाएँ जैसे वकील की सेवाएँ ; कच्चे माल उपयोग ।

🔹  निवेश :-

एक निश्चित समय में पूंजीगत वस्तुओं के स्टॉक में वृद्धि निवेश कहलाता है । इसे पूंजी निर्माण या विनियोग भी कहते हैं ।

🔹 मूल्यह्रास :- 

सामान्य टूट - फूट या अप्रचलन के कारण अचल परिसंपत्तियों के मूल्य में गिरावट को मूल्यह्रास या अचल पूंजी का उपभोग कहते हैं । मूल्यहास , स्थायी पूंजी के मूल्य को उसकी अनुमानित आयु ( वर्षों में ) से भाग करके ज्ञात किया जाता है ।

🔹 सकल निवेश :-

एक निश्चित समयावधि में पूँजीगत वस्तुओं के स्टॉक में कुल वृद्धि सकल निवेश कहलाती है । इसमें मूल्यह्रास शामिल होता है ।

🔹 निवल निवेश :- 

एक अर्थव्यवस्था में एक निश्चित समयावधि में पूंजीगत वस्तुओं के स्टॉक में शुद्ध वृद्धि निवल निवेश कहलाता है । इसमें मूल्यह्रास शामिल नहीं होता है ।

निवल निवेश = सकल निवेश - घिसावट ( मूल्य ह्रास )

🔹 आय के चक्रीय प्रवाह :- 

अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों के बीच वस्तुओं एवं सेवाओं एवं साधन सेवाओं तथा मौद्रिक आय के सतत् प्रवाह को आय का चक्रीय प्रवाह कहते हैं । इसकी प्रकृति चक्रीय होती है क्योंकि न तो इसका कोई आरम्भिक बिन्दु है और न ही कोई अन्तिम बिन्दु । वास्तविक प्रवाह उत्पादित सेवाओं तथा वस्तुओं और साधन सेवाओं का प्रवाह दर्शाता है । मौद्रिक प्रवाह उपभोग व्यय और साधन भुगतान के प्रवाह को दर्शाता है ।

🔹 स्टॉक :-

स्टॉक एक ऐसी मात्रा ( चर ) है जो किसी निश्चित समय बिन्दु पर मापी जाती है ; जैसे राष्ट्रीय धन एवं सम्पत्ति , मुद्रा की आपूर्ति आदि ।

🔹 प्रवाह :-

प्रवाह एक ऐसी मात्रा ( चर ) है जिसे समय अवधि में मापा जाता है ; जैसे राष्ट्रीय आय ; निवेश आदि ।

🔹 आर्थिक सीमा :-

यह सरकार द्वारा प्रशासित व भौगोलिक सीमा है जिसमें व्यक्ति , वस्तु व पूँजी का स्वतंत्र प्रवाह होता है ।

🔹 आर्थिक सीमा क्षेत्र :- 

1 . राजनैतिक , समुद्री व हवाई सीमा ।
2 . विदेशों में स्थित दूतावास , वाणिज्य दूतावास , सैनिक प्रतिष्ठान , राजनयिक भवन आदि ।
3 . जहाज तथा वायुयान जो दो देशों के बीच आपसी सहमति से चलाए जाते
4 . मछली पकड़ने की नौकाएँ , तेल व गैस निकालने वाले यान तथा तैरने वाले प्लेटफार्म जो देशवासियों द्वारा चलाए जाते हैं ।

🔹 सामान्य निवासी :-

किसी देश का सामान्य निवासी उस व्यक्ति अथवा संस्था को माना जाता है जिसके आर्थिक हित उसी देश की आर्थिक सीमा में केन्द्रित हों जिसमें वह सामान्यतः एक वर्ष से रहता है ।

🔹 उत्पादन का मूल्य :- 

एक उत्पादन इकाई द्वारा एक लेखा वर्ष में उत्पादित सभी वस्तुओं व सेवाओं का बाजार मूल्य उत्पादन का मूल्य कहलाता है ।

उत्पादन का मूल्य = बेची गई इकाई  x  बाजार कीमत + स्टॉक में परिवर्तन ।

🔹साधन आय :-

उत्पादन के साधनों ( श्रम , भूमि , पूँजी तथा उद्यम ) द्वारा उत्पादन प्रक्रिया में प्रदान की गई सेवाओं से प्राप्त आय , साधन आय कहलाती है । जैसे , वेतन व मजदूरी , किराया , ब्याज आदि ।

🔹 हस्तांतरण भुगतान :- 

यह एक पक्षीय भुगतान होते हैं जिनके बदले में कुछ नहीं मिलता है । बिना किसी उत्पादन सेवा के प्राप्त आय । जैसे वृद्धावस्था पेंशन , कर , छात्रवृत्ति आदि ।

🔹 पूँजीगत लाभ :- 

पूँजीगत सम्पत्तियों तथा वित्तीय सम्पत्तियों के मूल्य में वृद्धि , जो समय बीतने के साथ होती है , यह क्रय मूल्य से अधिक मूल्य होता है । यह सम्पत्ति की बिक्री के समय प्राप्त होता है ।


🔹 कर्मचारियों का पारिश्रमिक :- 

श्रम साधन द्वारा उत्पादन प्रक्रिया में प्रदान की गई साधन सेवाओं के लिए किया गया भुगतान ( नगर व वस्तु ) कर्मचारियों का पारिश्रमिक कहलाता है । इसमें वेतन , मजदूरी , बोनस , नियोजकों द्वारा सामाजिक सुरक्षा में योगदान शामिल होता है ।

🔹 परिचालन अधिशेष :- 

उत्पादन प्रक्रिया में श्रम को कर्मचारियों का पारिश्रमिक का भुगतान करने के पश्चात् जो राशि बचती है । यह किराया , ब्याज व लाभ का योग होता है ।

🔥 घरेलू समाहार 🔥

🔹 बाज़ार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद ( GDPMP ) :-

एक वर्ष की अवधि में अर्थव्यवस्था के घरेलू सीमा के अन्तर्गत उत्पादित समस्त अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के बाजार मूल्यों के योग को बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद कहते हैं ।

🔹 बाजार कीमत पर निवल देशीय उत्पाद ( NDPMP ) :-

NDPMP = GDPMP - मूल्यह्रास

🔹 साधन लागत पर निवल देशीय आय ( NDPFC ) :- 

एक अर्थव्यवस्था की घरेलू सीमा में एक लेखा वर्ष में उत्पादन कारकों की आय का योग , जो कारकों द्वारा प्रदान की गई सेवाओं के बदले प्राप्त होती है को देशीय आय कहते हैं ।

NDPFC = GDPMP - मूल्यह्रास - निवल अप्रत्यक्ष कर । 

🔥 राष्ट्रीय समाहार 🔥

🔹 बाजार कीमत पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद ( GNPMP ) :-

एक देश के सामान्य निवासियों द्वारा एक वर्ष में देश की घरेलू सीमा व विदेशों में उत्पादित अंतिम वस्तुओं व सेवाओं के बाजार मूल्यों के योग को GNPM कहते हैं । 

बाजार कीमत पर निवल राष्ट्रीय उत्पाद ( NNPMP ) : 

NNPMP = GNPMP - मूल्यह्रास

🔹 राष्ट्रीय आय ( NNPFC ) :- 

एक देश के सामान्य निवासियों द्वारा एक लेखा वर्ष में देश की घरेलू सीमा व शेष विश्व से अर्जित साधन आय का योग राष्ट्रीय आय कहलाती है । 

NNPFC = NDPFC + NFIA = राष्ट्रीय आय 

🔹 क्षरण :-

आय के चक्रीय प्रवाह से निकाली गई राशि ( मुद्रा के रूप में ) की क्षरण कहते हैं ; जैसे कर , बचत तथा आयात को क्षरण कहते हैं । 

🔹 भरण :- 

आय के चक्रीय प्रवाह में डाली गई राशि ( मुद्रा की मात्रा ) को भरण कहते हैं ; जैसे निवेश , सरकारी व्यय , निर्यात । 

🔹 वर्धित मूल्य ( मूल्यवृद्धि ) :- 

किसी उत्पादन इकाई द्वारा निश्चित समय में किए गए उत्पादन के मूल्य तथा प्रयुक्त मध्यवर्ती उपभोग के मूल्य का अंतर वर्धित मूल्य कहलाता है ।

🔹 दोहरी गणना की समस्या :-

राष्ट्रीय आय आंकलन में जब किसी वस्तु के मूल्य की एक से अधिक बार गणना की जाती है उसे दोहरी गणना कहते हैं । इससे राष्ट्रीय आय अधिमूल्यांकन दर्शाता है । इसलिए इसे दोहरी गणना की समस्या कहते हैं । 

कुछ महत्वपूर्ण समीकरण 

✳️ सकल = निवल ( शुद्ध ) + मूल्यह्रास ( स्थायी पूँजी का उपभोग ) 
✳️ राष्ट्रीय = घरेलू + विदेशों से प्राप्त निवल साधन आय । 
✳️ बाजार कीमत = साधन लागत + निवल अप्रत्यक्ष कर ( NIT ) 
✳️ निवल अप्रत्यक्ष कर ( NIT ) = अप्रत्यक्ष कर - सहायिकी ( आर्थिक सहायता ) 
✳️ विदेशों से शुद्ध साधन आय ( कारक ) = विदेशों से साधन आय - विदेशों को साधन आय 

राष्ट्रीय आय अनुमानित ( मापने ) करने की विधिया 
  
📚 आय विधि 📚

प्रथम चरण 👇

साधन लागत पर निवल घरेलू उत्पाद / निवल घरेलू साधन आय ( NDPFC ) = कर्मचारियों का पारिश्रमिक + प्रचालन अधिशेष + स्वयं नियोजितों की मिश्रित आय । 

द्वितीय चरण 👇

साधन लागत पर निवल राष्ट्रीय उत्पाद / राष्ट्रीय आय = साधन लागत पर निवल घरेलू उत्पाद + विदेशों से प्राप्त निवल साधन आय ।

 NNPFC = NDPFC + NFIA

📚 उत्पाद विधि अथवा मूल्य वर्द्धित विधि 📚

 प्रथम चरण 👇

बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद = प्राथमिक क्षेत्र द्वारा सकल वर्धित मूल्य + द्वितीयक क्षेत्र द्वारा सकल वर्धित मूल्य + तृतीयक क्षेत्र द्वारा सकल वर्धित मूल्य ।
बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद ( GDPMP ) = बिक्री + स्टॉक में परितर्वन - मध्यवर्ती उपभोग । 

द्वितीय चरण 👇 

बाजार कीमत पर निवल घरेलू उत्पाद NDPMP = बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद GDPMP - मूल्यह्रास । 

तृतीय चरण 👇 

साधन लागत पर निवल घरेलू उत्पाद ( NDPFC ) = बाजार कीमत पर निवल घरेलू उत्पाद ( NDPFC ) - शुद्ध अप्रत्यक्ष कर ( NIT ) 

चतुर्थ चरण 👇

साधन लागत पर निवल राष्ट्रीय उत्पाद / राष्ट्रीय आय ( NNPFC ) = साधन लागत पर निवल घरेलू उत्पाद ( NDPFC ) + विदेशों से प्राप्त निवल साधन आय ( NFIA )

📚 व्यय विधि 📚

प्रथम चरण 👇

बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद = निजी अंतिम उपयोग व्यय + सरकारी अंतिम उपयोग व्यय + सकल घरेलू पूँजी निर्माण + शुद्ध / निवल निर्यात् 
GDPMP = C + G + I + ( X - M ) 

द्वितीय चरण 👇

बाजार कीमत पर निवल घरेलू उत्पाद ( NDPMP ) = बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद ( GDPMP ) - मूल्यह्रास । 

तृतीय चरण 👇

साधन लागत पर निवल घरेलू उत्पाद ( NDPFC ) = बाजार कीमत पर निवल घरेलू उत्पाद ( NDPMP ) - शुद्ध अप्रत्यक्ष कर ( NIT )

चतुर्थ चरण 👇

साधन लागत पर निवल राष्ट्रीय उत्पाद / राष्ट्रीय आय ( NNPFC ) = साधन लागत पर निवल घरेलू उत्पाद ( NDPFC ) + विदेशों से प्राप्त निवल साधन आय ( NFIA )


🔹 विदेशों से प्राप्त निवल साधन आय ( NFIA ) :-

देश के सामान्य निवासियों द्वारा विदेशों को प्रदान की गई साधन सेवाओं से प्राप्त आय तथा विदेशों को दी गई साधन आय के बीच के अंतर को विदेशों से प्राप्त निवल साधन आय कहते हैं । इसके निम्न घटक होते हैं 

1 . कर्मचारियों का निवल पारिश्रमिक 
2 . सम्पत्ति तथा उद्यमवृत्ति से निवल आय तथा 
3 . विदेशों से निवासी कम्पनियों की शुद्ध प्रतिधारित आय । 

🔹 चालू हस्तांतरण :- 

वह गैर - अर्जित आय जो देने वाले ( Doner ) के चालू आय में से निकलता है और प्राप्त करने वाले ( Recipient ) के चालू आय में जोड़ा जाता है , उसे चालू हस्तांतरण आय कहते हैं । 

🔹 पूँजीगत हस्तांतरण :- 

वह गैर - अर्जित आय जो देने वाले के धन तथा पूँजी से निकलता है तथा प्राप्त करने वाले के धन तथा पूँजी में शामिल होता है ,  उसे पूंजीगत हस्तांतरण कहते हैं ।

12th class economic notes in hindi 1st book Introductory Macroeconomics chapter-1  National Income and Related Aggregates
12th class economic notes in hindi 1st book Introductory Macroeconomics chapter-1  National Income and Related Aggregates

🔹 सावधानियां : 🔹

1 . मूल्यवर्द्धित विधिः 

( i ) दोहरी गणना का त्याग । 
( ii ) वस्तुओं के पुनः विक्रय को सम्मिलित नहीं करते । 
( iii ) स्वउपयोग के लिए उत्पादित वस्तु को सम्मिलित किया जाता है । 

2 . आय विधिः 

( i ) हस्तांतरण आय को सम्मिलित नहीं करते है 
( ii ) पूजीगत लाभ को सम्मिलित नहीं करते । 
( iii ) स्वउपयोग उत्पादित वस्तु से उत्पन्न आय को सम्मिलित करते हैं । 
( iv ) उत्पाद कर्ता द्वारा प्रस्तु मुफ्त सेवाओं को सम्मिलित करते हैं ।

3 . व्यय विधिः 

( i ) मध्यवर्ती व्यय को सम्मिलित नहीं 
( ii ) पूनः विक्रय वस्तुओं पर रूपको सम्मिलित नहीं करते । 
( iii ) वित्तिय परिसम्पतियों पर व्यय सम्मिलित नहीं करते । 
( iv ) हस्तांतरण भुगतान का त्याग 

GDP का स्वरूप दो प्रकार का होता है । 

1 . वास्तविक GDP : 

एक अर्थव्यवस्था की घरेलू सीमा के अंतर्गत एक वर्ष की अवधि में उत्पादित सभी अंतिम वस्तओं एवं सेवाओं का , यदि मूल्यांकन आधार वर्ष की कीमतों ( स्थिर कीमतों ) पर किया जाता है तो उसे वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद कहते हैं । इसे स्थिर कीमतों पर सकल घरेलू उत्पाद भी कहते हैं । यह केवल उत्पादन मात्रा में परिवर्तन के कारण परिवर्तित होता हैं इसे आर्थिक विकास का एक सूचक माना जाता है । 

2 . मौद्रिक GDP : एक अर्थव्यवस्था की घरेल सीमा के अंतर्गत एक वर्ष की अवधि में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं का , यदि मूल्यांकन चालू वर्ष की कीमतों ( चालू कीमतों ) पर किया जाता है तो उसे मौद्रिक GDP कहते हैं । इसे चालू कीमतों पर GDP भी कहते हैं । यह उत्पादन मात्रा तथा कीमत स्तर दोनों में परिवर्तन से प्रभावित होता है । इसे आर्थिक विकास का एक सूचक नहीं माना जाता ।

12th class economic notes in hindi

चूंकि कीमत सूचकांक चालू कीमत अनुमानों को घटाकर स्थिर कीमत अनुमान के रूप में लाने हेतु एक अपस्फायक की भूमिका अदा करता है । इसलिए इसे सकल घरेलू उत्पाद अपस्फायक कहा जाता है ।

🔹 सकल घरेलू उत्पाद एवं कल्याण :-

सामान्यतः सकल घरेलू उत्पाद एवं कल्याण में प्रत्यक्ष संबंध होता है । उच्चतर GDP का अर्थ है वस्तुओं एवं सेवाओं के अधिक उत्पादन का होना । इसका तात्पर्य है कि वस्तुओं एवं सेवाओं की अधिक उपलब्धता । परन्तु इसका अर्थ यह निकालना कि लोगों का कल्याण पहले से अच्छा है , आवश्यक नहीं है । दूसरे शब्दों में , उच्चतर GDP का तात्पर्य लोगों के कल्याण में वृद्धि का होना , आवश्यक नहीं हैं ।

🔹 कल्याण :- 

इसका तात्पर्य लोगों के भौतिक सुख - सुविधाओं से है । यह अनेक आर्थिक एवं गैर - आर्थिक कारकों पर निर्भर करता है । आर्थिक कारक जैसे राष्ट्रीय आय , उपभोग का स्तर आदि और गैर - आर्थिक कारक जैसे पर्यावरण प्रदूषण , कानून व्यवस्था , सामाजिक अशांति आदि । वह कल्याण जो आर्थिक कारकों पर निर्भर करता है उसे आर्थिक कल्याण तथा जो गैर - आर्थिक कारकों पर निर्भर करता है उसे गैर आर्थिक कल्याण कहा जाता है । दोनों के योग को सामाजिक कल्याण कहा जाता है ।

🔹 निष्कर्ष :-

दोनों में अर्थात् GDP एवं कल्याण में प्रत्यक्ष सम्बन्ध है परन्तु यह संबंध निम्नलिखित कारणों से अपूर्ण एवं अधूरा है । GDP को आर्थिक कल्याण के सूचक के रूप में सीमाएँ निम्न हैं 

1 . बाह्यताएँ : इससे तात्पर्य व्यक्ति या फर्म द्वारा की गई उन क्रियाओं से है जिनका बुरा ( या अच्छा ) प्रभाव दूसरों पर पड़ता है लेकिन इसके लिए उन्हें दण्डित ( लाभान्वित ) नहीं किया जाता । उदाहरण - कारखानों का धुंआ ( नकारात्मक बाह्यताएँ ) तथा फ्लाईओवर का निर्माण ( सकारात्मक बाह्यताएँ ) । 

2 . GDP की संरचना : यदि GDP में वृद्धि , युद्ध सामग्री के उत्पादन में वृद्धि के कारण हैं तो GDP में वृद्धि से कल्याण में वृद्धि नहीं होगी । 

3 . GDP का वितरण : GDP में वृद्धि से कल्याण में वृद्धि नहीं होगी यदि आय का असमान वितरण है . अमीर अधिक अमीर हो जाएंगे तथा गरीब अधिक गरीब हो जाएंगे । 

4 . गैर - माद्रिक लेन - देन : GDP में कल्याण को बढ़ाने वाले गैर मौद्रिक लेन - देन को शामिल नहीं किया जाता है ।

Class 11 Economics CBSE Notes chapter 7 Forms of Market and Price Determination under perfect competition with simple applications ( 7 . बाजार के प्रमुख रूप तथा पूर्ण प्रतियोगिता में कीमत निर्धारण ) in hindi Medium 2019 , 2020 latest

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11th class economic notes in hindi 


11th class economic notes in hindi


11th class economic notes in hindi

बाजार से अभिप्राय एक ऐसी व्यवस्था से है जिसमें एक वस्तु या सेवा के क्रेता तथा विक्रेता क्रय - विक्रय हेतु एक - दूसरे के सम्पर्क में रहते हैं । 

बाजार निम्न आधार पर वर्गीकृत किए जाते हैं : 

( i ) क्रेताओं एवं विक्रेताओं की संख्या 
( ii ) वस्तु की प्रक्रति 
( iii ) फर्मों के प्रवेश तथा बहिर्गमन की स्वतंत्रता 
( iv ) कीमत निर्धारण 


बाजार के प्रमुख रूपः 

1 . पूर्ण प्रतियोगिता 
2 . एकाधिकार 
3 . एकाधिकारी प्रतियोगिता 
4 . अल्पाधिकार 

पूर्ण प्रतियोगिता : 

पूर्ण प्रतियोगिता बाजार का वह रूप है जिसमें बहुत बड़ी संख्या में क्रेता और विक्रेता उद्योग द्वारा निर्धारित कीमत पर समरूप वस्तु का क्रय - विक्रय करते हैं । 

🔹पूर्ण प्रतियोगिता में प्रति इकाई कीमत स्थिर रहने के कारण औसत व सीमांत संप्राप्ति समान रहते हैं । अत : इनके वक्र Ox - अक्ष के समांतर होते हैं ।


11th class economics notes in hindi

🔹 पूर्ण प्रतियोगिता में कीमत निर्धारण उद्योग द्वारा किया जाता है जो कि माँग एवं पूर्ति की शक्तियों से प्रभावित होता है । समरूप वस्तु होने के कारण कोई भी व्यक्तिगत फर्म या उपभोक्ता किसी वस्तु की कीमत को प्रभावित नहीं कर पाता । अत : उद्योग कीमत निर्धारक तथा फर्म कीमत स्वीकारक होती है । 

पूर्ण प्रतियोगिता की विशेषताएँ एवं निहितार्थ विक्रेताओं



एकाधिकार बाजार :- 

एक ऐसी बाजार व्यवस्था जहाँ एक अकेली फर्म ऐसी वस्तु का उत्पादन करता हो जिसका कोई निकट स्थानापन्न उपलब्ध न हो । इसमें अन्य फर्मों के प्रवेश पर प्रतिबंध होते हैं । एकाधिकार में फर्म अपने आप में उद्योग होती है तथा अपने अधिकतम फायदे के लिए कीमत निर्धारित करती है ।

विशेषताएं :-

( a ) एक विक्रेता
( b ) नए फर्मों के प्रवेश तथा बहिर्गमन पर पूर्ण प्रतिबंध
( c ) निकट स्थानापन्न वस्तु का अभाव
( D ) फर्म कीमत निर्धारक होती हैं ।
( E ) कीमत विभेद - समान वस्तु अथवा सेवा के लिए फर्म अलग - अलग ग्राहकों से अलग - अलग कीमत वसूलती है ।

🔹 मांग वक्र ऋणात्मक ढाल वाला होता है तथा मांग वक बेलोचदार ( कम लोचदार ) होता है ।

एकाधिकारिक प्रतियोगिता 

एक ऐसी बाजार व्यवस्था जिसमें क्रेताओं एवं विक्रेताओं की संख्या अधिक होती है तथा विक्रेता विभेदीकृत वस्तुओं को बेचते हैं जो रंग , आकार व रूप में एक - दूसरे से भिन्न होती हैं जिसके कारण उपभोक्ता को उत्पाद के विषय में पूर्ण ज्ञान नहीं होता है ।

विशेषताएं :-

( a ) क्रेता व विक्रेता की संख्या अधिक
( b ) वस्तु विभेद : वस्तुएँ विभेदीकृत होती हैं तथा एक - दूसरे के पूर्ण स्थानापन्न न होकर निकट स्थानापन्न होती हैं ।
( c ) विक्रय लागत - वस्तुओं के विज्ञापन एवं विक्रय प्रोत्साहन पर होने वाले व्यय अधिक
( d ) नई फर्मों के प्रवेश एवं निकास पर कोई प्रतिबंध नहीं ।
( e ) उपभोक्ता को पूर्ण ज्ञान का अभाव
( f ) मांग वक्र अधिक लोचदार होता है ।

अल्पाधिकार:- 

अल्पाधिकार बाजार का ऐसा स्वरूप है जिसमें वस्तु के उत्पादन हेतु बड़ी फर्मों की कम संख्या होती हैं । तथा कीमत तथा उत्पादन संबंधी निर्णयों में फर्मों में अन्तनिर्भरता पायी जाती है ।

विशेषताएँ :-

( a ) सभी फर्मे समरूप या विभेदात्मक वस्तुओं का उत्पादन करती हैं ।
( b ) बड़ी फर्मों की कम संख्या
( c ) अल्पाधिकार बाजार में नई फर्म का प्रवेश असंभव नहीं लेकिन कठिन होता है ।
( d ) अल्पाधिकार बाजार में मांग वक्र अनिश्चित होता है ।
( e ) अल्पाधिकार बाजार में कीमत तथा उत्पादन मात्रा के निर्धारण हेत फर्मों में अंतर्निर्भरता होती है । किसी भी फर्म द्वारा उत्पादन या कीमत के विषय में परिवर्तन हेतु उठाया गया कदम अन्य फर्मों की प्रतिक्रिया का कारण बनता है ।

🔹अल्पाधिकार को निम्न भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है

सहयोगी तथा असहयोगी अल्पाधिकार :- 

( 1 ) सहयोगी अल्पाधिकार : अल्पाधिकार का वह रूप जिसमें सभी फर्म आपसी सहयोग के आधार पर उत्पादन की मात्रा तथा कीमत निर्धारित करती है ।
( 2 ) असहयोगी अल्पाधिकार : अल्पाधिकार का वह रूप जिसमें कीमत तथा उत्पाद की मात्रा निर्धारित करते समय फर्मों के बीच सहयोगी व्यवहार की अपेक्षा प्रतियोगी व्यवहार होता है तथा प्रत्येक फर्म अपनी प्रतियोगी फर्मों की प्रतिक्रिया को ध्यान में रखकर अपने निर्णय लेती है ।

पूर्ण तथा अपूर्ण अल्पाधिकार :- 

( 1 ) पूर्ण अल्पाधिकार : पूर्ण अल्पाधिकार में सभी फर्मे सजातीय ( समरूप ) वस्तुओं का उत्पादन करती है
( 2 ) अपूर्ण अल्पाधिकार : अपूर्ण अल्पाधिकार में फर्मे विभेदात्मक वस्तुओं का उत्पादन करती है ।

बाजार के विभिन्न रूपों में तुलनात्मक अध्ययन


11th class economic notes in hindi

🔹 संतुलन कीमत : वस्तु की वह कीमत है जिस पर बाजार मांग तथा बाजार पूर्ति बराबर होते हैं ।

🔹 बाजार संतुलन : बाजार की वह अवस्था है जिसमें बाजार मांग तथा बाजार पूर्ति बराबर होते हैं । बाजार में अतिरिक्त मांग या अतिरिक्त पूर्ति की स्थिति का अभाव होता है ।

11th class economic notes in hindi
पूर्ण प्रतियोगिता बाजार में कीमत निर्धारण 

बाजार मांग तथा बाजार पूर्ति जहां एक दूसरे को काटते हैं अर्थात जहां बराबर होते हैं वह संतुलन बिन्दु कहलाता है । इस संतुलन बिन्दु पर स्थित कीमत संतुलन कीमत तथा इस बिन्दु की मात्रा संतुलन मात्रा कहलाती है । अत : बाजार की संतुलन कीमत तथा संतुलन मात्रा बाजार मांग तथा पूर्ति द्वारा निर्धारित की जाती है । बाजार मांग या बाजार पूर्ति में कोई भी परिवर्तन संतुलन बिन्दु , संतुलन कीमत तथा संतुलन मात्रा में परिवर्तन कर देता है ।

🔹पूर्ति में वृद्धि के कारण संतुलन कीमत तथा संतुलन मात्रा में प्रभावों की श्रृंखला-

( 1 ) पूर्ति में वृद्धि होने पर पूर्ति वक्र दाई ओर खिसकता है तथा नया पूर्ति वक्र s1 S बनता है ।
( 2 ) दी गई बाजार कीमत पर पूर्ति आधिक्य की स्थिति बन जाती है जो EF है ।
( 3 ) उत्पादकों में अपना उत्पाद बेचने हेतु प्रतियोगिता होती है ।
( 4 ) उत्पादक अपने उत्पाद की कीमतों में कमी करते हैं क्योंकि उनके वांछनीय स्टॉक बढ़ जाते हैं ।
( 5 ) कीमतों में कमी के कारण मांग में विस्तार तथा पूर्ति में संकुचन होता है । यह प्रक्रिया संतुलन बिन्दु प्राप्त होने तक चलती रहती है । जो →→ के निशान द्वारा दर्शाई गई । अब मांग = पूर्ति

परिणाम - संतुलन कीमत कम हो जाती है और संतुलन मात्रा में वृद्धि हो जाती है । अत : नई संतुलन कीमत P कम होकर P , नई संतुलन मात्रा 0 से बढ़कर , , तथा संतुलन बिंदु E से E , हो जाता है ।

उच्चतम कीमत तथा न्यूनतम कीमत का निर्धारण 

उच्चतम कीमत 

🔹जब सरकार ऐसा देखती है कि आवश्यक वस्तुओं की स्थिति में संतुलन कीमत इतनी अधिक हो गई है कि एक आम उपभोक्ता उस कीमत पर वस्तु नहीं खरीद पाता । ऐसी स्थिति में सरकार एक अधिकतम कीमत निर्धारण करती है जो संतुलन कीमत से कम होती है । सरकार द्वारा निर्धारित उच्चतम कीमत से अधिक कीमत पर उस वस्तु को नहीं बेचा जा सकता । सरकार यह कदम अक्सर उपभोक्ताओं के संरक्षण हेतु उठाती है ।

दूसरी ओर न्यूनतम कीमत 

समर्थित मूल्य निर्धारित करके उत्पादकों के हितों की रक्षा करती है । जब वस्तुओं का उत्पादन इतना अधिक हो जाता है कि । संतुलन कीमत अत्यधिक निम्न हो जाती है , तो ऐसी स्थिति में उत्पादकों , किसानों को हानि होती है । तब सरकार न्यूनतम समर्थित मूल्य का निर्धारण करती है , जो संतुलन कीमत से अधिक होती है ।

Class 11 micro Economics CBSE Notes chapter 6 Producer Behavior and Supply ( 6 . उत्पादक का व्यवहार और पूर्ति ) in hindi Medium 2019 , 2020 latest

Class 11 micro Economics CBSE Notes chapter 6 Producer Behavior and Supply ( 6 . उत्पादक का व्यवहार और पूर्ति ) in hindi Medium  latest


CBSE Revision Notes for CBSE Class 11 Economics Producer Behaviour and Supply Production function –Short-Run and Long-Run Total Product, Average Product and Marginal Product. Returns to a Factor Cost: Short run costs - total cost, total fixed cost, total variable cost; Average cost; Average fixed cost, average variable cost and marginal cost-meaning and their relationships. Revenue - total, average and marginal revenue - meaning and their relationships. Producer's equilibrium-meaning and its conditions in terms of marginal revenue-marginal cost. Supply, market supply, determinants of supply, supply schedule, supply curve and its slope, movements along and shifts in supply curve, price elasticity of supply; measurement of price elasticity of supply - (a) percentage-change method and (b) geometric method.


Class 11 Economic CBSE Notes in hindi  chapter 6 Producer Behavior and Supply


Class 11 Economic CBSE Notes in hindi  chapter 6 Producer Behavior and Supply


11 वीं कक्षा के अर्थशास्त्र सीबीएसई नोट्स अध्याय 6 उपभोक्ता उत्पादक का व्यवहार और पूर्ति हिंदी में।

Class 11 Economic CBSE Notes in hindi  chapter 6 Producer Behavior and Supply


उत्पादन फलन :- 

किसी वस्तु के भौतिक आगतों तथा भौतिक निगों के बीच फलनात्मक सम्बन्ध को उत्पादन फलन कहते हैं । 

उत्पादन फलन दो प्रकार के होते हैं - 

( i ) अल्पकालीन उत्पादन फलन :- 

जिसमें उत्पादन का एक साधन परिवर्तनशील होता है और अन्य स्थिर । इसमें एक साधन के प्रतिफल का नियम लागू होता है । इसमें उत्पादन को परिवर्तनशील साधन की इकाईयों को बढ़ाकर ही बढ़ाया जा सकता है । इसे परिवर्ती अनुपात के नियम से भी जाना जाता है ।

( ii ) दीर्घकालीन उत्पादन फलन :-

जिसमें उत्पादन के सभी साधन परिवर्तनशील होते हैं । इसमें पैमाने के प्रतिफल का नियम लागू होता है । इसमें उत्पादन के सभी साधनों को एक साथ समानुपात में बढ़ाकर उत्पादन बढ़ाया जाता है । 

कुल उत्पाद :- 

एक निश्चित समय में प्रयुक्त सभी परिवर्ती साधन ( कारक ) की इकाईयों द्वारा किए गए सीमांत उत्पादन का योग होता है अथवा TP = EMP अथवा एक फर्म एक निश्चित समयावधि में दी गई आगतों का प्रयोग करके किसी वस्तु की जो कुल मात्रा उत्पादित करती है , उसे कुल उत्पाद कहते हैं ।

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 कुल उत्पाद तथा सीमांत उत्पाद में सम्बन्ध :-

1 . जब कुल उत्पाद बढ़ती हुई दर से बढ़ता है तो सीमांत उत्पाद अधिकतम स्तर तक बढ़ता है । 
2 . जब कुल उत्पाद घटती हुई दर से बढ़ता है तो सीमांत उत्पाद घटता है परन्तु धनात्मक होता है । 
3 . जब कुल उत्पाद अधिकतम होता है तो सीमांत उत्पाद शून्य होता है । 
4 . जब कुल उत्पाद घटने लगता है तो सीमांत उत्पाद ऋणात्मक हो जाता है । 

औसत उत्पाद तथा सीमान्त उत्पाद मे संबंध :- 

🔹जब MP > AP , तब AP बढ़ता है । 
🔹 जब MP = AP , तब AP अधिकतम तथा स्थिर होता है । 
🔹जब MP < AP , तोAP घटने लगता है । 
🔹दोनों वक्रं ( MP तथा AP ) उल्टे ' U ' आकार की होती हैं ।

परिवर्तनशील अनुपात का नियम :-

अल्पकाल में स्थिर साधनों की दी हुई मात्रा के साथ परिवर्ती कारक की अतिरिक्त इकाईयों का प्रयोग किया जाता है तो कुल उत्पाद में होने वाले परिवर्तन को कारक के प्रतिफल का नियम कहा जाता है । इस नियम के अनुसार - यदि अन्य साधनों को स्थिर रखते हुये किसी परिवर्ती साधन की जैसे - जैसे अधिक से अधिक इकाइयाँ बढ़ायी जाती हैं तो कुल उत्पादन सर्वप्रथम बढ़ती दर से बढ़ता है , फिर घटती दर से बढ़ता है और अंतत : घटने लगता है । इसमें TP तथा MP में तीन चरणों में परिवर्तन होता है । 

( i ) TP बढ़ती दर से बढ़ता है , MP बढ़ता है । 
( ii ) TP घटती दर से बढ़ता है , MPघटता है पर धनात्मक रहता है ।
( iii ) TP घटता है , MP ऋणात्मक हो जाता है । 

🔹प्रथम चरण ( बढ़ते प्रतिफल की अवस्था ) : कुल उत्पाद बढ़ती हुई दर से बढ़ता है : स्थिर साधनों के साथ जब परिवर्ती कारक की इकाइयों को लगातार बढ़ाकर प्रयोग किया जाता है तो प्रारम्भ में कुल उत्पाद बढ़ती दर पर बढ़ता है तथा MP भी बढ़ता है । 

🔹द्वितीय चरण ( घटते प्रतिफल की अवस्था ) : कुल उत्पाद घटती हई दर से बढ़ता है : स्थिर कारकों की निश्चित मात्रा के साथ जब परिवर्ती कारक की इकाइयों का लगातार बढ़ाकर प्रयोग किया जाता है । तब एक सीमा के पश्चात् कुल उत्पाद घटती दर से बढ़ता है अर्थात् कुल उत्पाद वृद्धि अनुपात परिवर्ती कारक अनुपात से कम होता है MP घटने लगता है धनात्मक रहता है । जब TP अधिकतम होता है तो MP शून्य होता है । 

🔹ततीय चरण ( ऋणात्मक प्रतिफल की अवस्था ) - कुल उत्पाद घटता है : यह कारक प्रतिफल नियम का अंतिम चरण है । जब स्थिर कारकों की निश्चित मात्रा के साथ परिवर्ती कारक की इकाईयाँ लगातार बढ़ाकर उत्पादन किया जाता है तो अंतत : कुल उत्पाद घटने लगता है और सीमांत उत्पाद ऋणात्मक हो जाता है । 

लागत की अवधारणा:-

स्पष्ट तथा अस्पष्ट लागतों तथा सामान्य लाभ के योग को लागत कहते हैं । लागत - स्पष्ट लागत + अस्पष्ट लागत + सामान्य लाभ । 

स्पष्ट लागतः-

वे वास्तविक मौद्रिक भुगतान जो उत्पादक द्वारा कारक व गैर कारक आगतों के प्रयोग के लिए किए जाते हैं जिनका स्वामी , उत्पादक स्वयं नहीं है स्पष्ट लागतें कहलाती हैं । उदाहरण : मजूदरी व वेतन का भुगतान , किराया , ब्याज आदि ।

अस्पष्ट लागतः-

अस्पष्ट लागतें उत्पादन प्रक्रिया में उत्पादक द्वारा प्रयुक्त निजी कारकों की अनुमानित लागत है , जिसने सामान्य लाभ भी शामिल होता है । उदाहरणः स्वयं की भूमि का लगान , स्वयं की पूँजी पर ब्याज आदि ।

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कुल लागत :-

एक फर्म द्वारा किसी वस्तु की एक निश्चित मात्रा का उत्पादन करने के लिए साधान आगतों और गैर साधन आगतों पर किए गए कुल व्यय की कुल लागत कहते है। 

🔹 कुल लागत कुल बंधी लागत तथा कुल परिवर्ती लागत का योग होती है । 

TC = TFC + TVC 

🔹 कुल बंधी लागत से अभिप्रायः उस लागत से है जो उत्पादन के सभी स्तरों पर समान रहती है तथा उत्पादन के शून्य स्तर पर भी शून्य नहीं होती । इसका वक्र X - अक्ष के समान्तर होता है । 

TFC = TC - TVC or TFC = AFC x Q 

🔹कुल परिवर्ती लागत से अभिप्रायः उस लागत से है जो उत्पादन में होने वाले परिवर्तन के अनुसार परिवर्तित होती है । यह उत्पादन के शून्य स्तर पर शून्य होती है । इसका वक्र कुल लागत वक्र के समांतर होता है । 

TVC = TC - TFC or TVC = AVC x Q . 

🔹वस्तु की प्रति इकाई लागत को औसत लागत कहते है । यह औसत बंधी लागत व औसत परिवर्ती लागत का योग होती है । 

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🔹औसत बंधी लागत से अभिप्रायः प्रति इकाई बंधी लागत से है । 

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अल्पकालीन लागतों के पारस्परिक सम्बन्ध 

🔹कुल लागत वक्र तथा कुल परिवर्ती लागत वक्र एक दूसरे के समान्तर होते हैं दोनों के बीच की लम्बवत् दूरी कुल बंधी लागत के समान होती है । TFC वक्र x - अक्ष के समान्तर होता है जबकि TVC वक्र TC वक्र के समांतर होता है । 

🔹उत्पादन स्तर में वृद्धि के साथ औसत बंधी लागत वक्र व औसत लागत वक्र के बीच अंतर बढ़ता चला जाता है , इसके विपरीत औसत परिवर्ती लागत वक्र व औसत लागत वक्र के बीच अंतर में उत्पादन वृद्धि के साथ - साथ कमी आती है , किन्तु AC व AVC एक - दूसरे को कभी नहीं काटते क्योंकि औसत बंधी लागत कभी शून्य नहीं होती ।

सीमांत लागत तथा औसत परिवर्ती लागत में संबंध 

🔹जब MC < AVC , AVC घटता है । 
🔹जब MC = AVC , AVC न्यूनतम तथा स्थिर होता है । 
🔹 जब MC > AVC , AVC बढ़ता है । 

सीमांत लागत तथा औसत लागत में संबंध 

🔹जब MC < AC , AC घटता है । 
🔹 जब MC = AC , AC न्यूनतम तथा स्थिर होता है । 
🔹 जब MC > AC , AC बढ़ता है ।

संप्राप्ति की अवधारणा 

कुल संप्राप्ति ( TR ) : 
यह वह मौद्रिक राशि होती है जो एक निश्चित समयावधि में फर्म को उत्पाद की दी हुई इकाईयों की बिक्री से प्राप्त होती है । 

TR = कीमत ( AR ) x बेची गई मात्रा ( Q  ) अथवा TR = EMR 

औसत संप्राप्ति ( AR ) : बेची गई वस्तु की प्रति इकाई सम्प्राप्ति को औसत संप्राप्ति कहते हैं । यह वस्तु की कीमत के बराबर होती है ।

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वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई बेचने से कुल संप्राप्ति में होने वाला परिवर्तन सीमांत संप्राप्ति ( MR ) कहलाता है ।

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MR तथा AR में संबंध 

🔹जब MR > AR , AR बढ़ता है । 
🔹जब MR = AR , AR स्थिर होता है । 
🔹जब MR < AR , AR घटता है ।

 जब प्रति इकाई कीमत स्थिर रहती है तब औसत , सीमांत व कुल संप्राप्ति में संबंध ( पूर्ण प्रतियोगिता ) 

( a ) औसत व सीमांत संप्राप्ति उत्पादन के सभी स्तरों पर स्थिर रहती है तथा इनका वक्र x - अक्ष के समांतर होता है । 
( b ) कुल संप्राप्ति स्थिर दर से बढ़ती है व इसका वक्र मूल बिन्दु से गुजरने वाली धनात्मक ढ़ाल वाली सीधी रेखा के समान होता है ।

🔹 जब वस्तु की अतिरिक्त मात्रा बेचने के लिए प्रति इकाई कीमत घटाई जाए अथवा एकाधिकार व एकाधिकारात्मक बाजार में TR , AR तथा MR में संबंध ।

( a ) AR व MR वक्र नीचे की ओर गिरते हुए ऋणात्मक ढ़ाल वाले होते हैं । MR वक्र AR वक्र के नीचे रहता है । 
( b ) दूसरे शब्दों में AR व MR दोनों घटते हैं लेकिन MR , AR की तुलना में तेजी से घटता है । 
( c ) TR घटती दर से बढ़ता है तथा MR घटता है परन्तु धनात्मक रहता है । 
( d ) TR में उस स्थिति तक वृद्धि होती है जब तक MR धनात्मक होता है । जहाँMR शून्य होगा वहाँTR अधिकतम होता है और जब MR ऋणात्मक हो जाता है तब TR घटने लगता है ।

 उत्पादक संतुलन की अवधारणा 

उत्पादक से अभिप्रायः उत्पादन की संतुलन वह अवस्था है , जिसमें उत्पादक को प्राप्त होने वाले लाभ अधिकतम होता है तथा जिसमें वह किसी प्रकार का परिवर्तन पसन्द नहीं करता । 

सीमांत लागत व सीमांत संप्राप्ति विचारधारा : इस विचारधारा के अनुसार संतुलन की शर्ते निम्न हैं 

( a ) सीमांत संप्राप्ति व सीमांत लागत समान हों । 
( b ) संतुलन बिन्दु के पश्चात् उत्पादन में वृद्धि की स्थिति में सीमांत लागत सीमांत संप्राप्ति से अधिक हो । 

पूर्ति की अवधारणा 

पूर्ति : जब एक विक्रेता किसी वस्तु की विभिन्न कीमतों पर तथा निश्चित समयावधि में जितनी मात्रा बेचने के लिए तैयार होता है तो उसे उस वस्तु की पूर्ति कहते हैं । 

किसी वस्तु की पूर्ति को प्रभावित करने वाले कारक 

🔹वस्तु की कीमत 
🔹अन्य संबंधित वस्तुओं की कीमतें 
🔹आगतों की कीमतें 
🔹उत्पादन की तकनीक 
🔹फर्मों की संख्या
🔹फर्मों का उद्देश्य 
🔹कर तथा आर्थिक सहायता से संबंधित सरकारी नीति ।

पूर्ति वक्र : 

🔹पूर्ति अनुसूची का रेखाचित्र प्रस्तुतीकरण है जो वस्तु की विभिन्न कीमतों पर पूर्ति की मात्राओं को दर्शाता है । 

पूर्ति वक्र एवं उसका ढ़ाल : 

🔹पूर्ति वक्र का ढ़ाल धनात्मक होता है । यह वस्तु की कीमत तथा उसकी पूर्ति में प्रत्यक्ष संबंध को बताता है । 

🔹पूर्ति वक्र का ढ़ाल = कीमत में परिवर्तन / पूर्ति मात्रा में परिवर्तन

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पूर्ति का नियम : 

🔹अन्य बातें समान रहने पर वस्तु की कीमत बढ़ने से पूर्ति की मात्रा बढ़ जाती है तथा कीमत कम होने से पर्ति की मात्रा भी कम हो जाती है।

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व्यक्तिगत पूर्ति अनुसूची से अभिप्राय : 

🔹उस अनुसूची से है जो एक वस्तु की विभिन्न मात्राओं को दर्शाएँ जिन्हें एक उत्पादक एक निश्चित समयावधि में कीमत के विभिन्न स्तरों पर बेचने का इच्छुक होता है । 

बाजार पूर्ति अनुसूची से अभिप्राय :

🔹उस अनुसूची से है जो किसी वस्तु की उन विभिन्न मात्राओं को दर्शाएँ , जिन्हें उस वस्तु के सभी उत्पादक एक निश्चित समयावधि में कीमत के विभिन्न स्तरों पर बेचने के इच्छुक होते हैं ।

पूर्ति अनुसूची : 

किसी वस्तु की विभिन्न संभावित कीमतों पर बेची जाने वाली वस्तु की विभिन्न इकाइयों का सारणीयन प्रस्तुतीकरण ही पूर्ति अनुसूची कहलाती है । 

पूर्ति की कीमत लोच 

पूर्ति की कीमत लोच वस्तु की कीमत में परिवर्तनों के कारण वस्तु की पूर्ति की मात्रा की अनुक्रियाशीलता को मापती है , अथवा वस्तु की पूर्ति मात्रा में प्रतिशत परिवर्तन तथा वस्तु की कीमत में प्रतिशत परिवर्तन के बीच अनुपात को पूर्ति की कीमत लोच कहते हैं ।

Class 11 Economic CBSE Notes in hindi  chapter 6 Producer Behavior and Supply

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